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Showing posts from November, 2018

हाल ही में नासा ने सूर्य की अध्ययन के लिए एक यान (सोलर पार्कर प्रोब ) भेजा।

हाल ही में नासा ने एक  यान प्रक्षेपित किया है, जो पृथ्वी के निकटतम तारे सूर्य के बाहरी कोरोना के चक्कर लगाएगा, और इस प्रकार हमें सूर्य की अधिक जानकारी देगा। इस यान का नाम 91 वर्षीय अंतरिक्ष विज्ञानी पार्कर क नाम पर पार्कर सोलर प्रोब रखा गया है। सूर्य के इतने निकट पहुँचने वाली यह मानवनिर्मित पहली वस्तु है। सात वर्षों के अपने मिशन में यह यान 24 बार सूर्य के कोरोना या बाहरी वायुमंडल में पहुँचेगा। सूर्य के वातावरण से एकत्रित डाटा मिलने पर हम शायद सोलर विंड्स के बारे में कुछ जान सकेंगेयूजीन पार्कर ने 60 वर्ष पहले ही इनके अस्तित्व को लेकर जानकारी दी थी। सोलर विंड्स अगर बड़ी और शक्तिशाली हों, तो वे पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र और उपग्रहों, दूरसंचार और पावर ग्रिड को प्रभावित कर सकती हैं। यान की खोजों की मदद से आने वाली सौर-आंधियों की बेहतर भविष्यवाणी की जा सकेगी। इस रोबोटयान की गति 6,90000 कि.मी. प्रति घंटा है, जो किसी भी मानवनिर्मित मशीन से सबसे ज्यादा है। अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में मिली यह अभूतपूर्व सफलता है। इससे यह भी सिद्ध होता है कि तकनीक की सीमाएं लगातार फैलती जा रही...

पुलिस सुधार पर एक नजर ।

22 सितम्बर को प्रति वर्ष "पुलिस सुधार दिवस" मनाया जाता है। इस दिन के महत्व के पीछे के इतिहास में झाँकने पर पता चलता है कि 1902-03 में फ्रेजर आयोग ने कहा था कि पुलिस बलअपनी क्षमता के हिसाब से बहुत पीछे है। यह एक संगठन और प्रशिक्षण की दृष्टि से अनेक कमियों से घिरा हुआ है। यह भ्रष्ट और दमनकारी है। यह जनता का विश्वास जीतने में विफल रहा है।" 115 वर्ष पूर्व पुलिस बल के बारे में कहे गए ये शब्द आज भी शतप्रतिशत लागू होते दिखाई पड़ते हैं। यही कारण है कि पुलिस सुधार दिवस की आवश्यकता समझी गईऔर इसकी शुरूआत की गई।  पुलिस बल की कमियों को दूर करने के लिए समयसमय पर अनेक प्रयास किए गए हैं। अलगअलग राज्यों ने इससे संबंधित आयोगों का गठन किया है। दुर्भाग्यवश किसी भी आयोग ने पुलिस बल पर पड़ने वाले अवांछित दबावों से उसे बचाने के लिए कोई उपाय नहीं किए।  सन् 1977 में तत्कालीन केन्द्र सरकार ने राष्ट्रीय पुलिस आयोग का गठन किया था। 1979-81 के बीच आयोग ने आठ विस्तृत रिपोर्ट सौंपी। लेकिन भारत की केन्द्रीय सरकार ने इन रिपोर्टों में प्रस्तावित सुधारों का उपयोग केवल दिखावे के लिए किया। सन 200...

सामाजिक न्याय पर एक नजर ।

सार्वजनिक नीति से संबंधित उच्चतम न्यायालय के किसी भी निर्णय में नागरिकों को दो प्रकार की अपेक्षाएं होती हैं। (1) कोई भी निर्णय भारतीय संविधान से सुसंगत हो,और (2) उसके निर्णय से प्रशासन को शक्ति मिलनी चाहिए। न्यायालय के समक्ष अनुसूचित जाति/जनजाति को पदोन्नति में आरक्षण दिए जाने का मामला था, जिसमें उसने उपरोक्क् वर्णित दोनों ही बिन्दुओं पर अपने को सिद्ध नहीं किया। न्यायालय ने 2006 के निर्णय में सरकार द्वारा अनुसूचित जाति/जनजाति के सरकारी कर्मचारियों की संख्या को एकत्रित करने को दरकिनार कर दिया। सरकार ने 1992 में इंदिरा साहनी के मामले में नौ सदस्यीय पीठ के उस फैसले का भी संज्ञान नहीं लिया, जिसमें कहा गया था कि अनुसूचित जाति/जनजाति के मामले में क्रीमी लेयर पर विचारविमर्श का कोई मतलब नहीं है। इंदिरा साहनी के मामले में संवैधानिक प्रावधानों का हवाला देते हुए न्यायालय ने यह स्पष्ट किया था कि अनुसूचित जाति/जनजाति को आरक्षण इसलिए नहीं दिया जा रहा है, क्योंकि वे गरीब हैं, बल्कि इसलिए दिया जा रहा है, क्योंकि वे अपवर्जित या समाज से बाहर रखे गए हैं। अनुच्छेद 335 में इस वर्ग के आरक्षण को ...

भारतीय राजनीति में जातीय समीकरण देश के लिए अभिशाप।

जाति व्यवस्था भारतीय समाज का अटूट अंग रही है और इनमें जीवन के सभी पक्षों को प्रभावित किया है। स्वतंत्रता से पूर्व भी जाति व्यवस्था का राजनीति जीवन पर काफी प्रभाव रहा है। तथा इसके बाद जाति व्यवस्था का अंत नहीं हुआ हालांकि उसका स्वरूप अवश्य परिवर्तित हुआ। भारत के राजनीतिक आधुनिकरण के प्रारंभ होने के पश्चात सामान्य रूप से यह धारणा विकसित हुई कि पश्चिमी राजनीति तंत्र और जनतंत्रत्मक मूल्यों को अपनाने के फल स्वरूप भारतीय समाज से जातिवाद का अंत हो जाएगा ।किंतु गत 50 वर्षों में राजनीति संस्थाओं की कार्यप्रणाली और सामान्य राजनीतिक जीवन के अनुभव से इस बात का संकेत मिलता है ।कि भारत की सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था पर जातिवाद का प्रभाव अभी भी विद्यमान है।   वास्तव में सामाजिक और राजनीतिक जीवन को एक दूसरे से पूर्णता पृथक नहीं किया जा सकता वह अन्योन्य आश्रित तथा एक दूसरे के पूरक है ।दोनों एक दूसरे को प्रभावित करते हैं और एक दूसरे के स्वरूप को निर्धारित करने के लिए समान महत्व रखते हैं।  जातिवाद का प्रभाव राजनीतिक दलों निर्वाचन का राजनीतिक लाभ के वितरण में परिलक्षित ह...

भारत में सांप्रदायिकता एक बड़ी समस्या।

एक विशेष विचार भाव या पूजा पद्धति को मानने वाले समूह को संप्रदाय के नाम से जाना जाता है। मेरे कहने का आशय यह है की किसी विशेष मत या विचार के लोगों द्वारा समग्र राष्ट्र के प्रति निष्ठावान ना होकर केवल अपने मत विचार के प्रति अति निष्ठावान होना ही संप्रदायिकता है। जब विविध संप्रदाय अपने प्रति अंध भक्ति रखकर दूसरे संप्रदायों से घृणा  करने लगते हैं तो यही अपने आगे की क्रम में संप्रदायिकता की भावना को पैदा करता है दूसरे शब्दों में संप्रदाय का असहिष्णु उठना संप्रदायिकता है ।     प्राचीन काल में विभिन्न समय पर भिन्न-भिन्न स्थानों से लोगों के प्रवास ने भारतीय संस्कृति को समृद्ध किया है।  शताब्दियों के अंत मिश्रण आत्मीयता तथा समायोजन ने भारतीयों के मानव जाति एकरूपता को विकास किया है। भारतीय भाषाओं का विकास भी विभिन्न मानव जाति तत्वों से हुआ है। वे सैकड़ों वर्षो तक एक दूसरे के संपर्क में रहे, जिससे हमारी मुख्य भाषाई समूह का जन्म हुआ। भारत के संविधान द्वारा मान्य 22 भाषाओं सहित 1652 मान्य भाषाएं यहां की आश्चर्यजनक विविधता के प्रमाण हैं।  भारत जिसे इ...

आज कल योग की प्रासंगिकता।

अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पूरे विश्व में 21 जून 2015 को एक साथ मनाया गया और तब से लेकर आज तक और आगे भी मनाया जाएगा। योग का अर्थ है जीवन की प्रणाली। इसके तहत यह समझाना है कि जीवन की प्रणाली कैसे बनती है और इसका इस्तेमाल उलझन के लिए नहीं बल्कि मानसिक परेशानी के लिए कैसे किया जा सकता है । अब शरीर को कैसे स्थिर किया जाए यह सबसे बड़ा प्रश्न है शरीर को स्थिर करना सीखना आसान नहीं। 70 और 80 के दशक मे घरों में टेलीविजन पहुंचा था तो घर के ऊपर अल्मुनियम एंटीना लगा होता था।जब उसे ढंग से दुरुस्त या सही दिशा में किया जाता था तो घर बैठे पूरी दुनिया चली आती थी क्योंकि उसेंडी ने को सही दिशा में दे दी गई थी।  इसी प्रकार इस शरीर में अपार क्षमताएं हैं यदि आप इसे सही दिशा में इसे आगे बढ़ाएंगे तो आप पूरे ब्रह्मांड को इसमें समाहित कर सकेंगे। यही योग है । योग का अर्थ है जोड़ना। जुड़ने का भावार्थ है की व्यक्ति और ब्रह्मांड के बीच का अंतर समाप्त हो जाना। तब कुछ भी व्यक्तिगत नहीं है कुछ भी सार्वभौमिक नहीं है सब कुछ आप ही हैं यानी आप योग में है इसका अर्थ या नहीं की आपने किसी चीज की कल्पना की बल्कि...

राजनीति एवं प्रशासन में भ्रष्टाचार ।

भारतीय राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था में नैतिकता एवं ईमानदारी की उपस्थिति खत्म होती जा रही है। इसी कारण 20 वीं सदी का अंतिम दशक यदि भारतीय राजनीति में घोटाला युग कहा जाए तो अतिशयोक्ति ना होगी। भ्रष्टाचार आज आवश्यक एवं साधारण बात हो चुकी है।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी भ्रष्टाचार की समस्याओं को देश के लिए एक बड़े खतरे के रूप में वर्णित किया है। भ्रष्टाचार की समस्या प्राचीन काल से ही विद्यमान रही है।प्राचीन लोक कथाओं से लेकर ऐतिहासिक दस्तावेजों तक भ्रष्टाचार एक चर्चित समस्या रही है। सल्तनत युग, मुगल एवं राजशाही व्यवस्थाओं में भ्रष्टाचार के पर्याप्त साक्ष्य मौजूद हैं। ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा अपने कर्मियों को कम वेतन प्रदान किए जाने के कारण उनके अधिकांश कर्मी किसी न किसी रूप में भ्रष्टाचार के कीचड़ में फंसे थे। देश में आजादी के बाद भारत में प्रचार बहुत तेजी से बढ़  है। किसी भी क्षेत्र में देखिए लोगों के मन में या धारणा बन गई है कि बिना रिश्वत दिए कोई भी कार्य हो ही नहीं सकता।आज भ्रष्टाचार हमारी राजनीति एवं प्रशासनिक व्यवस्था में कुल मिल गया है।     ...