अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पूरे विश्व में 21 जून 2015 को एक साथ मनाया गया और तब से लेकर आज तक और आगे भी मनाया जाएगा। योग का अर्थ है जीवन की प्रणाली। इसके तहत यह समझाना है कि जीवन की प्रणाली कैसे बनती है और इसका इस्तेमाल उलझन के लिए नहीं बल्कि मानसिक परेशानी के लिए कैसे किया जा सकता है । अब शरीर को कैसे स्थिर किया जाए यह सबसे बड़ा प्रश्न है शरीर को स्थिर करना सीखना आसान नहीं। 70 और 80 के दशक मे घरों में टेलीविजन पहुंचा था तो घर के ऊपर अल्मुनियम एंटीना लगा होता था।जब उसे ढंग से दुरुस्त या सही दिशा में किया जाता था तो घर बैठे पूरी दुनिया चली आती थी क्योंकि उसेंडी ने को सही दिशा में दे दी गई थी।
इसी प्रकार इस शरीर में अपार क्षमताएं हैं यदि आप इसे सही दिशा में इसे आगे बढ़ाएंगे तो आप पूरे ब्रह्मांड को इसमें समाहित कर सकेंगे। यही योग है ।
योग का अर्थ है जोड़ना। जुड़ने का भावार्थ है की व्यक्ति और ब्रह्मांड के बीच का अंतर समाप्त हो जाना। तब कुछ भी व्यक्तिगत नहीं है कुछ भी सार्वभौमिक नहीं है सब कुछ आप ही हैं यानी आप योग में है इसका अर्थ या नहीं की आपने किसी चीज की कल्पना की बल्कि इसका अर्थ यह है कि आपने क्या अनुभव किया। अनुभव तभी होता है जब आप सही दिशा में हो अन्यथा वह नहीं होगा। इस शरीर को स्थिर करना सीखने का मतलब आप अपने एंटीना को सही दिशा में दुरुस्त कर रहे हैं।अगर आप सही दिशा में स्थिर रहेंगे तो पूरा हस्ती तो आपके भीतर उतर आएगा यह योग अनुभव का एक जबरदस्त उपकरण है।
आमतौर पर योग के सभी महान लाभ उसकी प्रतिक्रिया है। शुरू में लोग योग की तरफ इसलिए आकर्षित होते हैं क्योंकि उससे विभिन्न प्रकार के स्वास्थ्य लाभ होते हैं और तनाव से मुक्ति मिलती है। निश्चित रूप से शारीरिक और मानसिक लाभ हैं।
लोग शारीरिक और मानसिक बदलाव का अनुभव कर सकते हैं। ऐसे कई लोग जिन्हें अपने पुराने रोगों से चमत्कारिक रूप से मुक्ति मिली है। शांति ,प्रसन्नता और स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से योग से निश्चित रूप से कई लाभ है लेकिन योग्य विशेष प्रकृति नहीं है। योग के बारे में असली चीज या है कि यह आपको जीवन का बड़ा अनुभव देता है और एक व्यक्ति होने के अपेक्षाकृत आप एक सार्वभौम प्रक्रिया के अंग बन जाते हैं। आप देखेंगे कि इसमें अनोखे परिणाम आपको प्राप्त होंगे।
योग के बारे में जब पहली बार भौतिक आयाम की जानकारी दी जाती है और तब यह बताया जाता है की मानव प्रणाली इस अंतरिक्ष ज्यामिति से कितनी भिन्न है । हम रचना की ज्यामिति की बात करते हैं। अगर हम ज्यामिति की सही जानकारी रखते हैं और उसमें प्रवीण हो जाते हैं तब सारा टकराव समाप्त हो जाता है । आंतरिक टकराव का अर्थ होता है कि आप अपने विरुद्ध काम कर रहे हैं। यानी आप अपने आप में एक समस्या है। जब आप स्वयं एक समस्या हैं तब अन्य समस्याओं से आप कैसे मुकाबला करेंगे।
सब कुछ तनावपूर्ण है। आप अपने जीवन में स्वयं समस्या ना बने। यदि आपके पास अन्य समस्याएं हैं तो उन पर बात करते हैं।विश्व में तमाम तरह की चुनौतियां मौजूद है आप जितनी गतिविधियां करेंगे उतनी चुनौतियां आएंगी और यह सिलसिला चलता रहेगा । लेकिन आपका शरीर मस्ती भावनाएं ऊर्जा आपके जीवन की बाधाएं नहीं बननी चाहिए।
अगर इन सब कुछ ठीक से दुरुस्त कर दिया जाए तो आपका शरीर और मन ऐसे-ऐसे काम करने में सक्षम हो जाएगा जिसके बारे में आपने कभी कल्पना नहीं की होगी। अचानक लोग समझने लगेंगे कि आप महामानव बन गए हैं।अगर आप ज्यामिति से तालमेल बिठा लेते हैं तब चाहे व्यापार हो घर हो प्रेम हो युद्ध हो जो कुछ भी हो आप एक ऊंचे स्तर की कुशलता और क्षमता के साथ यह सारे काम कर पाएंगे। ऐसा इसलिए है कि चाहे चेतना अवस्था हो या अवचेतन अवस्था सब ज्यामिति का काम है । आमतौर पर या कोई चीज समझने जैसी है लेकिन सैद्धांतिक रूप से या अस्तित्व की ज्यामिति है। सही ज्यामिति प्राप्त होने से आप सही दिशा में अग्रसर हो जाएंगे ।
योग का अर्थ 1 विशेष अभ्यास करना या अपने शरीर को हिलाना नहीं है योग का अर्थ है अपने उच्च स्वभाव तक पहुंचने के लिए किया गया कोई भी तरीका । आप जो टेक्नोलॉजी उपयोग में लाते हैं उसे योग कहा जाता है।
जीवन में योग क्यों आवश्यक है ?निश्चित रूप से इसका शारीरिक लाभ है।
यह एक व्यक्ति के लिए बहुत कुछ है।इससे व्यक्ति अपनी स्वास्थ्य सुधार सकते हैं और अपने शरीर को और लचीला बना सकते हैं।लेकिन एक स्वस्थ शरीर के साथ भी जीवन में और और स्थिरता बनी रहेगी ।किस ग्रह पर अस्वस्थ और डैनी लोगों से अधिक संख्या में स्वस्थ और दुखी लोग हैं। यदि आपको बीमारी है तो कम से कम आप के पास एक अच्छा बहाना है। अधिकतर लोगों के पास तो यह भी नहीं । योग के साथ शारीरिक स्वास्थ्य और मानसिक खुशी मिलेगी। लोग सरल योग प्रक्रियाओं से अनूठा स्वास्थ्य लाभ प्राप्त कर सकते हैं लेकिन इससे जीवन में स्थिरता नहीं आती।
जब तक आप अस्तित्व है मानव के सभी पक्षों को जाने बिना तब तक आप संघर्ष पूर्ण सीमित जीवन जिएंगे।एक बात मानव शरीर और बुद्धि के साथ इस विश्व में आने पर आप जीवन के सभी पक्षों को ढूंढने में सक्षम होते हैं। यदि ऐसा नहीं होता तो व्यक्ति को कष्ट होता है क्योंकि यह शरीर एक सीमित मात्र होता है। और अन्य पक्षों के अनुभव से वंचित है यह जीवन की प्रकृति है आप जैसे ही इसे रोकते हैं यह संघर्ष करता है।
आज तंत्रिका सिद्धांत तथा आधुनिक विज्ञान जीवन के पक्षों की बात करता है हम योग प्रणाली में हमेशा जीवन के 21 पक्षों की बात करते हैं।यदि आप अभी उपलब्ध 3 पक्षों के साथ कितना अधिक करते हैं तो आपके पास एक किस पक्षों के साथ जीवन में अधिक स्वतंत्रता प्राप्त करेंगे।आप आसानी से जीवन से निपटने लगेंगे क्योंकि सभी पक्ष जीवंत है और आपके अनुभव के भीतर हैं।
योग के विषय में वास्तविक बात यह है कि लोग आपको संपूर्ण समावेशी बनाता है या आपके जीवन के अनुभव को इतना व्यापक और संपूर्ण समावेशी बनाता है कि आप व्यक्ति के बदले एक सार्वभौमिक प्रक्रिया हो जाते हैं जो कि प्रत्येक मनुष्य के रूप में मौलिक रूप में निहित है आप जहां कहीं भी होंगे आप अभी जो कर रहे हैं उससे अधिक करना चाहेंगे।यह बात मायने नहीं रखती कि आपकी सोच किस पर है अथवा नीचे है फिर भी आप जो हैं उससे अधिक होना चाहते हैं। यदि थोड़ा बहुत कुछ होता है तो आप चाहते हैं कि कुछ और हो। क्या जो आप चाहते हैं। आप सीमा रहित विस्तार चाहते हैं या सीमा रहित विस्तार सार्वजनिक संसाधनों से नहीं हो सकता शारीरिक संसाधन एक निश्चित सीमा है यदि आप सीमा हटाते हैं तो कुछ भी शारीरिक नहीं बचता ।
यह सीमाहीन तभी तो भावना बनती है जब एक पक्ष शरीर से बाहर निकल कर आप के साथ एक जीवंत वास्तविकता बन जाता है।
यदि एक पक्ष निरंतर रूप से आपके अनुभव में शरीर से आगे रहता है तब आप शरीर से मुक्त होते हैं और आप जीवन और मृत्यु की प्रक्रिया से मुक्त होते हैं क्योंकि यह शरीर से जुड़े हैं स्वतंत्रता का अर्थ क्या है? सीमा रहित होना और सीमा रहित शारीरिक नहीं हो सकता।
इस संपूर्ण प्रक्रिया का उद्देश्य आपके शरीर से बाहर अनुभव को लाना और उसे बनाए रखना है यदि एक बार आप इसे संपर्क में आते हैं तो आप एक कृति नहीं बल्कि अपने जीवन के सृजनात्मक का कार्य करते हैं।
इस प्रकार अगर निष्कर्ष की बात करें तो हम कह सकते हैं कि योग मानव जीवन के सर्वांगीण विकास के लिए आवश्यक है और आने वाले समय में इसकी प्रासंगिकता बढ़ेगी जो मानव जीवन को एक नया आयाम और आधार प्रदान करेगी।
धन्यवाद ।
धर्म और विज्ञान का सम्बन्ध।
धर्म और विज्ञान दोनों सामाजिक उत्थान के प्रमुख अंग है।यद्यपि की दोनों विश्वव्यापी पद हैं किंतु दोनों का संबंध एक दूसरे के पूरक रूप में है। एक मानव की भावना तथा अंतर्ज्ञान की वस्तु है तो दूसरा मानव की बुद्धि की वस्तु है। अर्थात धर्म हृदय से उत्पन्न निर्विकार भाव से है जो मनुष्य की नैतिकता का संचालन करता है और विज्ञान मस्तिक से तथ्य परख सिद्धांत जो भौतिकता का पोषण करता है हालांकि जिज्ञासा दोनों में सतत बनी रहती है। धर्म का विकास अंतर्मुखी होता है।जबकि विज्ञान का संबंध अंतर्मुखी और ब्रह्म मुखी दोनों रुप में होता है । जिज्ञासा की प्रबलता ही इन दोनों की कसौटी है। धार्मिक व्यक्ति सदा समाज कल्याण के लिए नए-नए व्रत, उपवास स्थान विधि, जल तर्पण आदि करता है। यह क्रियाएं विज्ञान की कसौटी पर खरी उतरी है। धर्म और विज्ञान का संबंध एक दूसरे के पूरक के रूप में चलते रहने में ही मानव समाज का कल्याण है।धर्म में रूढ़िवादिता है तो विज्ञान में तर्क सिलता परंतु दोनों में जिज्ञासा प्रमुख रूप से परिलक्षित होती है जो कि दोनों का प्राण है।
धर्म और विज्ञान का सम्बन्ध।
धर्म और विज्ञान दोनों सामाजिक उत्थान के प्रमुख अंग है।यद्यपि की दोनों विश्वव्यापी पद हैं किंतु दोनों का संबंध एक दूसरे के पूरक रूप में है। एक मानव की भावना तथा अंतर्ज्ञान की वस्तु है तो दूसरा मानव की बुद्धि की वस्तु है। अर्थात धर्म हृदय से उत्पन्न निर्विकार भाव से है जो मनुष्य की नैतिकता का संचालन करता है और विज्ञान मस्तिक से तथ्य परख सिद्धांत जो भौतिकता का पोषण करता है हालांकि जिज्ञासा दोनों में सतत बनी रहती है। धर्म का विकास अंतर्मुखी होता है।जबकि विज्ञान का संबंध अंतर्मुखी और ब्रह्म मुखी दोनों रुप में होता है । जिज्ञासा की प्रबलता ही इन दोनों की कसौटी है। धार्मिक व्यक्ति सदा समाज कल्याण के लिए नए-नए व्रत, उपवास स्थान विधि, जल तर्पण आदि करता है। यह क्रियाएं विज्ञान की कसौटी पर खरी उतरी है। धर्म और विज्ञान का संबंध एक दूसरे के पूरक के रूप में चलते रहने में ही मानव समाज का कल्याण है।धर्म में रूढ़िवादिता है तो विज्ञान में तर्क सिलता परंतु दोनों में जिज्ञासा प्रमुख रूप से परिलक्षित होती है जो कि दोनों का प्राण है।
धर्म मानव का अंतर्मुखी विकास करके जन कल्याण की भावना जागृत करता है। दूसरी और विज्ञान सतत धारणा व साधना द्वारा मानव कल्याण के नए-नए उपक्रम एवं सामग्री उपलब्ध करता है। विकृति दोनों में है धर्म की भीरुता एवं रूढ़िवादिता ने समाज को खोखला कर दिया तो दूसरी और विज्ञान की संघात्मक शक्तियों ने मानव जीवन को अनिश्चित बना दिया है।
धर्म अर्थ काम और मोक्ष चारों ही मानव की साधना के प्रमुख उपकरण हैं। इन्हीं चारों के द्वारा वह मोक्ष जैसी दुर्लभ वस्तु को पा लेता है।
समाज तथा मानव धर्म एवं अर्थ तथा विज्ञान इस प्रकार संबंध है कि उन्हें पृथक नहीं किया जा सकता। बिना अर्थ के धर्म नहीं और विज्ञान भी अर्थ के बिना कुछ नहीं कर सकता । यदि अर्थ तंत्र उनके अनुरूप ना हुआ। धर्म तथा विज्ञान की साधना तभी सफल हो सकती है जबकि अर्थ तंत्र साथ दें।
धर्म और विज्ञान के विकास की जड़ प्रशासन तंत्र में निहित होती है।
दोनों को रक्षण प्रशासन द्वारा ही मिलता है। प्रशासन द्वारा धर्म एवं विज्ञान दोनों के विकास के लिए नीतियां बनाई जाती हैं और प्रशासन उन्हें समाज तथा वैज्ञानिकों द्वारा लागू करता है। प्रशासन द्वारा यदि संरक्षण ना दिया जाए तो दोनों की प्रगति असंभव है।
पाषाण युग से लेकर धर्म और विज्ञान दोनों मानव की प्रगति के लिए सतत प्रत्याशी रहे हैं। विज्ञान समाज की नवीन अनुभूतियां देकर नवीनता से परिचित कराता है तो धर्म उसका अंतर्मुखी विकास करके समाज कल्याण की और बढ़ाता है धर्म एवं विज्ञान का समन्वित रूप आदि काल से चला आ रहा है जब जब भी इन दोनों में सामंजस्य स्थापित नहीं होता समाज में आ शांति का वातावरण पैदा हो जाता है यह असली जब उत्पन्न होती है जब धर्म में रूढ़िवादिता तथा भीरुता आ जाती है। और विज्ञान द्वारा नवीन आविष्कार किए जाते हैं तथा उनसे धर्म की पुरानी मान्यताओं पर आघात होता है।धर्म यदि मानव को जन्म देता है तो विज्ञान मानव को जीना सिखाता है।इसका समन्वित रूप ही समाज को सुखी और समृद्ध ताली बनाता है तथा इसका संघर्ष समाज का विनाश करता है। विज्ञान ना तो धर्म का बहिष्कार करता है और ना उसका अपमान है या तो सहयोगी बनकर समाज के कल्याण के लिए सतत प्रयत्नशील रहना चाहता है क्योंकि जिज्ञासा ही विज्ञान का जीवन है जिज्ञासा द्वारा नवीन शोध और अनुसंधान में रहकर वैज्ञानिक मानव कल्याण के लिए नित्य नए उपकरण खोजता है। अत : धर्म और विज्ञान का समन्वित रूप ही इसकी प्रमुख उपलब्धियां है ।
धर्म और विज्ञान के लिए समन्वित रूप द्वारा नित्य समाज के लिए नए आयाम खोले जाते हैं और समाज की प्रगति आबद्ध रूप से चलती रहती है। परंतु धर्म और विज्ञान में जब संघर्ष चढ़ता है तो समाज की प्रगति रुक जाती है समाज में क्रांति का वातावरण तैयार हो जाता है। धर्म की पूरी मान्यताएं और रूढ़िवादिता मुखरित हो जाता है। इस प्रकार समाज की दयनीय स्थिति हो जाती है। विज्ञान समाज को जीवन देता है, सुख सुविधाएं देता है तथा नित्य नए संसार की ओर ले जाता है परंतु उसका अंकुश मानव के ऊपर सदा सर्वदा बना रहता है।व समस्त विकास को एक क्षण में ही नष्ट भी कर सकता है समाज का अस्तित्व बल देता है।
स्थूल रूप से देखने पर धर्म और विज्ञान परस्पर विरोधी प्रतीत होते हैं जो धर्मांध है इनके द्वारा विज्ञान की उपेक्षा की जाती है और जो विज्ञानानंद हैं वे धर्म की किंतु व्यापक रूप से अवलोकन करने पर प्रतीत होता है प्रकृति के कण कण में धर्म और विज्ञान का संयुक्त निवास है। धर्म और विज्ञान में मानव जाति के विकास में समान रूप से सहयोग किया है। धर्म ने मानसिक आत्मिक दृढ़ता प्रदान की है तो विज्ञान ने भौतिक दृष्टि से उन्नत। ऐतिहासिक तथ्यों से यह स्पष्ट होता है कि जहां से एवं चरक एक चिकित्सा वैज्ञानिक के रूप में समाज में योगदान किया वहीं विश्वामित्र और वशिष्ठ आदि जैसे प्रबुद्ध धार्मिक व्यक्तित्व थे।
धर्म और विज्ञान समाज के कल्याण के लिए बनाए गए हैं परंतु समाज में विभिन्न आयामों द्वारा उसे कुछ जोड़ने और घटाने में समाज के विकास में क्रमशः उन्नति और अवनति होती है। तथा समाज दोनों का अस्तित्व खो बैठता है। दोनों के विकास तथा अंतर्मुखी और बाह्य मुखी एक समय ओम नियम देता है तो दूसरा उस पर चलने के लिए साधन। दोनों के विकास तथा हानी में ही समाज का विकास और हानी निहित है। धर्म में अनुभूति हैं तो विज्ञान में जिज्ञासा।
जहां धर्म और दर्शन करता है वही विज्ञान है मंजिल तक पहुंचाता है विज्ञान और धर्म के बिना और धर्म विज्ञान के बिना ना केवल अंधे लंगड़े के समान हैं अपितु किसी भी दृष्टि से अपूर्ण है। दोनों का संबंध हमारे विकास के लिए आवश्यक है ।
धन्यवाद ।

Comments
Post a Comment