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Hello my Dear Reader ..I am a blogger, I am  Engineer by  Profession. I write regularly on this blog on contemporary events in the country as well as world. You can read posts written by me on this blog regularly. This will make me very happy. And if you have any suggestions then definitely share it with me. If I would like your suggestion, I would definitely share your post.

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बच्चों को शारीरिक दंड देना कहा तक उचित और अनुचित।

यह जरूरी नहीं कि हम दंड के माध्यम से ही किसी समस्या का समाधान करें हां लेकिन यह कुछ हद तक हम ऐसा कर सकते हैं । बच्चे का दिमाग बचपना अवस्था में बहुत कोमल होता है। हमें दंड देते समय वह सारा प्रयास करना चाहिए कि बच्चे डरे नहीं, बल्कि उसे समझे क्योंकि डर बच्चे को कमजोर बना सकती है।घर में माता पिता और स्कूलों में अध्यापकों को इस बात का ध्यान रखना चाहिए।हमें समझना चाहिए कि यदि कोई बालक किसी भी प्रकार की गलती करता है तो वह उसकी उम्र है और इस उम्र में बच्चे ऐसा करते हैं और जब वह ऐसा करें तो हमें उन्हें प्रेम से समझाना चाहिए और उन्हें बताना चाहिए कि यह अमुक वस्तु आपने तोड़ दिया है सोचिए फिर आप कैसे खेलेंगे तो कल खेलना है नहीं तो मैं दूसरी ला दूंगा लेकिन इसे दोबारा मत तोड़ना, कहने का अर्थ बच्चे को ज्यादातर उसकी गलती पर समझाएं और इस तरह समझाए कि उसे यह न लगे कि आप उस पर नाराज है या गुस्से में समझा रहे हैं।इस तरह से वह समझेगा भी और उसके बुद्धि का विकास भी होगा और आने वाले जीवन में भी वह बहुत सी समस्याओं का समाधान स्वयं कर सकेगा और हम एबी जानते हैं कि संसार में सुख कम और दुख ज्यादा है तो...

भारत में सांप्रदायिकता एक बड़ी समस्या।

एक विशेष विचार भाव या पूजा पद्धति को मानने वाले समूह को संप्रदाय के नाम से जाना जाता है। मेरे कहने का आशय यह है की किसी विशेष मत या विचार के लोगों द्वारा समग्र राष्ट्र के प्रति निष्ठावान ना होकर केवल अपने मत विचार के प्रति अति निष्ठावान होना ही संप्रदायिकता है। जब विविध संप्रदाय अपने प्रति अंध भक्ति रखकर दूसरे संप्रदायों से घृणा  करने लगते हैं तो यही अपने आगे की क्रम में संप्रदायिकता की भावना को पैदा करता है दूसरे शब्दों में संप्रदाय का असहिष्णु उठना संप्रदायिकता है ।     प्राचीन काल में विभिन्न समय पर भिन्न-भिन्न स्थानों से लोगों के प्रवास ने भारतीय संस्कृति को समृद्ध किया है।  शताब्दियों के अंत मिश्रण आत्मीयता तथा समायोजन ने भारतीयों के मानव जाति एकरूपता को विकास किया है। भारतीय भाषाओं का विकास भी विभिन्न मानव जाति तत्वों से हुआ है। वे सैकड़ों वर्षो तक एक दूसरे के संपर्क में रहे, जिससे हमारी मुख्य भाषाई समूह का जन्म हुआ। भारत के संविधान द्वारा मान्य 22 भाषाओं सहित 1652 मान्य भाषाएं यहां की आश्चर्यजनक विविधता के प्रमाण हैं।  भारत जिसे इ...