जाति व्यवस्था भारतीय समाज का अटूट अंग रही है और इनमें जीवन के सभी पक्षों को प्रभावित किया है। स्वतंत्रता से पूर्व भी जाति व्यवस्था का राजनीति जीवन पर काफी प्रभाव रहा है। तथा इसके बाद जाति व्यवस्था का अंत नहीं हुआ हालांकि उसका स्वरूप अवश्य परिवर्तित हुआ। भारत के राजनीतिक आधुनिकरण के प्रारंभ होने के पश्चात सामान्य रूप से यह धारणा विकसित हुई कि पश्चिमी राजनीति तंत्र और जनतंत्रत्मक मूल्यों को अपनाने के फल स्वरूप भारतीय समाज से जातिवाद का अंत हो जाएगा ।किंतु गत 50 वर्षों में राजनीति संस्थाओं की कार्यप्रणाली और सामान्य राजनीतिक जीवन के अनुभव से इस बात का संकेत मिलता है ।कि भारत की सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था पर जातिवाद का प्रभाव अभी भी विद्यमान है।
वास्तव में सामाजिक और राजनीतिक जीवन को एक दूसरे से पूर्णता पृथक नहीं किया जा सकता वह अन्योन्य आश्रित तथा एक दूसरे के पूरक है ।दोनों एक दूसरे को प्रभावित करते हैं और एक दूसरे के स्वरूप को निर्धारित करने के लिए समान महत्व रखते हैं।
जातिवाद का प्रभाव राजनीतिक दलों निर्वाचन का राजनीतिक लाभ के वितरण में परिलक्षित होता है ।सभी राजनीतिक दलों में जातीय आधार पर अनेक गुट बनाए गए हैं ।जिसमें प्रतिस्पर्धा की भावना विद्यमान है विभिन्न राजनीतिक दल निर्वाचन के अवसर पर अपने उम्मीदवारों का चयन करते समय उनकी योग्यता से ज्यादा संबंधित निर्वाचन क्षेत्रों के विभिन्न जातियों की जनसंख्या को विशेष रूप से दृष्टि से देखते हैं। चुनाव अभियान में जातिवाद को साधन के रूप में अपनाया जाता है। और प्रत्याशी जिस निर्वाचन क्षेत्र में चुनाव लड़ रहा है। उस निर्वाचन क्षेत्र में जातिवाद की भावनाओं को बढ़ाया बढ़ाया जाता है। ताकि संबंधित प्रत्याशी की जाति के मतदाताओं का पूर्ण समर्थन प्राप्त किया जा सके । इसमें संदेह नहीं कि भारत में मतदाताओं का मतदान व्यवहार बहुत कुछ जाति पर आधारित रहा है चुनाव के बाद राजनीति नेतृत्व भी अक्सर जातीय आधार पर तय होता है । और मंत्रिमंडल के निर्माण में भी जाति भेदभाव का प्रभाव किसी न किसी रूप में आ ही जाता है । राजनीति क्षेत्र में जातिवाद के इस प्रभाव के चलते ही सामान्य धारणा पाई जाती है। कि जातिवाद में भारतीय संसदीय लोकतंत्र के रूप को विकृत कर दिया है । राज्यों में जातिवाद का प्रभाव अपेक्षाकृत अधिक वर्ष विशेष धान का दिखाई देता है । भारतीय राज्यों में जातिगत क्षेत्रीय पार्टियों का उदय इसका उदाहरण है । क्षेत्रीय पार्टियों के उदय के कारण दशकों से वंचित शोषित वर्गों का राजनीति में प्रवेश इन ही कारण ही इनका स्वरूप साकार हो पाया है । भारतीय राजनीति और विभिन्न राजनीतिक संस्थाओं की कार्यप्रणाली में जाति भेदभाव इस तरह घुल मिल गए हैं । कि यह संस्थाएं सुचारू रूप से कार्य करने में असमर्थ रहे हैं । जातिवाद के इस प्रभाव के कारण ही विकास संबंधी मुद्दे गोल हो गए हैं। यदि कोई जाति विशेष का प्रत्याशी भ्रष्टाचार तथा अपराध आदि मामलों में लिप्त पाया जाता है ।तो भी राजनीति दल किसी न किसी प्रकार इन तत्वों को छुपाकर उसे जातिगत वोट प्राप्त करने के लिए प्रत्याशी बनाते हैं ।
काफी हद तक ठीक है कि (भारत के) नए राजनीतिक तंत्र के परिपेक्ष के अंतर्गत जाति भारती समाज का एक केंद्रीय तत्व है। यद्यपि इसमें जनतंत्र राजनीतिक के मूल्य और उपाय तथा साधनों को ग्रहण किया है। ऐसा लगता है कि राजनीति में जातिवाद एक साधन के रूप में अपनाया गया है क्योंकि इसके माध्यम से राजनीति समर्थन प्राप्त करने और अंततोगत्वा राजनीतिक सत्ता प्राप्त करने में सहायता करती है।
जाति भेदभाव पर आधारित राजनीति गतिविधियां वास्तव में देश की राजनीति आधुनिकरण के लिए घातक और राष्ट्रीय एकीकरण में बाधक सिद्ध हुई है। जाति जागरूकता ने एक और विभिन्न जाति समूहों को एकता के सूत्र में बाधा और उनमें राजनीतिक जागृति उत्पन्न की तो दूसरी ओर इससे संपूर्ण समाज को और भी छोटे-छोटे समूहों में विभाजित कर दिया है। इससे जाति भेदभाव राजनीतिक पक्षपात तथा सामाजिक अन्याय की भावना का और ज्यादा विकास हुआ है। अभी तक जातिवाद केवल सामाजिक जीवन तक सीमित था और राजनीतिक क्षेत्र उसने प्रभावित नहीं था किंतु जाति पर आधारित समूहों के निर्माण के बाद जातिवाद का प्रभाव राजनीतिक क्षेत्र में काफी बढ़ गया है।
भविष्य भारतीय राजनीति में जातिवाद का क्या स्वरूप होगा और भारतीय राजनीति कहां तक अपने को जाति के प्रभाव से मुक्त कर रखेगी इस संबंध में कोई अंतिम मतभेद करना कठिन है लेकिन सैद्धांतिक रूप से या निष्कर्ष निकालना गलत ना होगा कि शिक्षा के लिए प्रसार और आधुनिकरण के मूल्यों को वास्तविक रुप से अपनाए जाने के बाद विभिन्न जाति समूह राजनीति क्षेत्र में सफलता प्राप्त करने के लिए समानता और धर्मनिरपेक्षता की अभिवृद्धि को अपनाने के लिए मजबूर होंगे। इस अवस्था में जातिवाद का विनाश भले ही ना हो लेकिन राजनीति क्षेत्र में जातिवाद एक चर्चा का तत्व बनकर रह जाएगा ।
जातिवाद के प्रभाव को भारतीय राजनीति से दूर करना अति आवश्यक है। अन्यथा देश के आर्थिक व सामाजिक दोनों ही रूपों में कमजोर होता जाएगा और हमारी कमजोरी का सबसे बड़ा यही कारण है।
धन्यवाद ।
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मुझे आपका लेख पढ़ करके बहुत खुशी हुई आप ऐसे ही लिखते रहे ।
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