ज्ञान के विभिन्न स्रोतों का सम्यक संकलन साहित्य है । किसी भी देश की सभ्यता एवं संस्कृति का स्पष्ट निरुपण उसके साहित्य में मिलता है । किसी भी देश का उत्कृष्ट साहित्य वहाँ का सुसभ्य | एवं सुसंस्कारित समाज का परिचायक होता है । साहित्य में जिस सुन्दर समाज की कल्पना की जाती है , उसे वास्तविकता में ढालना समाज का कर्तव्य होता है । ध्यातव्य हो कि साहित्य रूपी भवन का निर्माण समाज के आधार पर ही होता है । निश्चय ही साहित्य | सर्वथा देशकालिक होता है । सामाजिक परिस्थितियाँ जैसी होगी , उस काल के साहित्य का स्वरूप भी तद्नुरुप होगा । आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के शब्दों में , " ज्ञान राशि के संचित कोष का नाम साहित्य है । " बाबू श्याम सुन्दर दास के शब्दों में , “ सामाजिक मस्तिष्क अपने पोषण के लिए जो भाव सामग्री निकालकर समाज को सौंपता है उसी के संचित कोष का नाम साहित्य है । " उपन्यास सम्राट प्रेमचन्द्र ने साहित्य को जीवन का संस्कार मानते हुए लिखा है कि “ साहित्य हमारे जीवन को स्वाभाविक और सुन्दर बनाता है । दूसरे शब्दों में उसकी बदौलत मन का संस्कार होता है । यही प्रमुख उद्देश्य है । ...
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