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पुलिस सुधार पर एक नजर ।



22 सितम्बर को प्रति वर्ष "पुलिस सुधार दिवस" मनाया जाता है। इस दिन के महत्व के पीछे के इतिहास में झाँकने पर पता चलता है कि 1902-03 में फ्रेजर आयोग ने कहा था कि पुलिस बलअपनी क्षमता के हिसाब से बहुत पीछे है। यह एक संगठन और प्रशिक्षण की दृष्टि से अनेक कमियों से घिरा हुआ है। यह भ्रष्ट और दमनकारी है। यह जनता का विश्वास जीतने में विफल रहा है।" 115 वर्ष पूर्व पुलिस बल के बारे में कहे गए ये शब्द आज भी शतप्रतिशत लागू होते दिखाई पड़ते हैं। यही कारण है कि पुलिस सुधार दिवस की आवश्यकता समझी गईऔर इसकी शुरूआत की गई।  पुलिस बल की कमियों को दूर करने के लिए समयसमय पर अनेक प्रयास किए गए हैं। अलगअलग राज्यों ने इससे संबंधित आयोगों का गठन किया है। दुर्भाग्यवश किसी भी आयोग ने पुलिस बल पर पड़ने वाले अवांछित दबावों से उसे बचाने के लिए कोई उपाय नहीं किए। 

सन् 1977 में तत्कालीन केन्द्र सरकार ने राष्ट्रीय पुलिस आयोग का गठन किया था। 1979-81 के बीच आयोग
ने आठ विस्तृत रिपोर्ट सौंपी। लेकिन भारत की केन्द्रीय सरकार ने इन रिपोर्टों में प्रस्तावित सुधारों का उपयोग
केवल दिखावे के लिए किया। सन 2006 में उच्चतम न्यायालय ने पुलिस सुधारों से संबंधित सात व्यापक दिशानिर्देश दिए। इनमें से छः राज्य सरकारों और एक केन्द्र सरकार के लिए था। इन दिशानिर्देशों में राज्यों को तीन तरह की संस्थाएं बनाने को कहा गया था। (1) राज्य सुरक्षा आयोग (पुलिस को अतिरिक्त दबावों से मुक्त रखने हेतु) (2) पुलिस स्थापना बोर्ड (पुलिस अधिकारियों को निर्णय लेने में स्वायत्तता प्रदान करने हेतु, और (3) पुलिस अभियोग प्राधिकरण (पुलिस वालों को उत्तरदायी बनाने हेतु।) इन दिशानिर्देशों में पुलिस महानिदेशक हेतु उत्कृष्ट अधिकारी के चुनाव संबंधी प्रक्रिया भी वर्णित की गई है। साथ ही, राज्यों को कानूनव्यवस्था की जाँचपड़ताल की प्रक्रिया से अलग रखने की बात कही गई है, ताकि किसी भी मामले की गहन एवं निष्पक्ष जाँच की जा सके। केन्द्र सरकार को राष्ट्रीय सुरक्षा आयोग बनाने संबंधी दिशानिर्देश दिए गए हैं।


             उच्चतम न्यायालय के 12 साल पहले दिए गए इन दिशानिर्देशों के बाद, आज तक उन पर अमल नहीं हो सका है। सत्रह राज्यों ने न्यायालय के आदेशों के पालन हेतु अधिनियम पारित किएकिन्तु उन्हें किनारे ही रखा।
अन्य राज्यों ने तो ऐसे कार्यकारी आदेश जारी किएजो न्यायालय के दिशानिर्देशों के प्रतिकूल हैं। कुछ राज्यों में
न्यायालय के आदेश के अनुकूल पुलिस संस्थाओं का गठन तो किया, परन्तु या तो उनके अधिकारों को कम कर
दिया गया, या फिर उनका रूप ही बदल दिया गया। पुलिस महानिदेशक का चयन भी मनमाने तरीके से ही किया जा रहा है। कानूनव्यवस्था को जाँचपड़ताल से अलग रखने वाले मामले में भी बहुत ढील है। न्यायालय ने पुलिस सुधारों पर नजर रखने के लिए जस्टिस थॉमस समिति का गठन किया था, जिसने 2010 मे अपनी रिपोर्ट पेश करते हुए राज्यों के पुलिस सुधारों के प्रति निराशाजनक रवैये की बात कही है। 2012 में हुए निर्भया कांड को लेकर बनी जस्टिम वर्मा समिति ने एक बार फिर उच्चतम न्यायालय द्वारा राज्यों को दिए गए छः दिशानिर्देशों को संपूर्ण रूप से अंगीकृत करने पर जोर दिया है।



निष्कर्ष
किसी भी कांड का राज्यों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा है। दरअसलवे औपनिवेशिक मानसिकता से बाहर निकलना ही नहीं। चाहते हैं। इसके दो कारण हैं-(1) पुलिस की शक्ति का दुरुपयोग करना उनकी सहूलियत है। (2) पुलिस बल पर नौकरशाही के आधिपत्य को छोड़ पाना उनको स्वीकार्य नहीं है। नेताओं और नौकरशाहों के बीच की यह सांठगांठ बहुत मजबूत है। यह किसी भी नीति, कांड और सुधार का गला घोंटने में माहिर है। सत्ताधारी पक्ष इस तथ्य को स्वीकार करने में चूक रहा है कि देश की आर्थिक सुधारों की गति एवं राजनैतिक स्थिरता
का आधार निष्पक्ष और कुंठारहित पुलिस बल है। एक ऐसे देश में कोई भी विदेशी निवेशक क्यों आना चाहेगा, जहाँ कानून व्यवस्था की स्थिति खराब हो? प्रधानमंत्री का स्मार्ट पुलिस का सपना तब तक पूरा नहीं हो सकता, जब तक कि राज्यों को सुधारों को अपनाने के लिए तैयार न किया जाए। पुलिस सुधारों का मूल उद्देश्य, पुलिस की शोभा बढ़ाना नहीं है। इसका लक्ष्य तो जनता की सुरक्षा बढ़ाना, कानूनव्यवस्था को कायम रखना एवं सुशासन की स्थापना करना है।




                                                                                               स्रोत-सेकंड एडमिनिस्ट्रेटिव रिपोर्ट 
धन्यवाद ।






क्यों न नक्सलियों को जड़ से समाप्ति कर दी जाये।








हल ही में गृहमंत्री ने इस बात का दावा किया है कि भारत नक्सलवाद समाप्ति के करीब है। उनका ऐसा दावा
करना बताता है कि हमारे सुरक्षा बलों ने नक्सलियों को काबू में कर लिया है। दक्षिण एशियाई आतंकवाद पोर्टल के अनुसार 2018 के शुरूआती छ: माह में ही पूरे देश में122 नक्सली मारे जा चुके हैं। आठ वर्षों में पहली बार इतने कम समय में इतनीबड़ी संख्या में नक्सली मारे गए हैं। नक्सलियों के दम तोड़ने का प्रमाण उनका 223
जिलों से 90 जिलों में सिमट जाना है।जिस प्रकार से सरकार ने सुरक्षा और विकास को आधार बनाकर अपनी नीतियाँ और कार्ययोजना को अंजाम दिया है, उसी के परिणामस्वरूप नक्सली समस्या पर नियंत्रण पाया जा सका है। सरकार ने नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में सड़क, स्कूल मोबाईल टावरबैंक, पोस्ट- ऑफिस आदि का निर्माण करने के साथ ही इन क्षेत्र की गरीबी को कम करने की दिशा में कदम उठाए हैं। ब्रूकिंग्स ब्लॉक में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार 2022 तक भारत के 3 प्रतिशत से कम लोग गरीब कहलाए जाएंगे। एक अनुमान के अनुसार 2030 तक बहुत ज्यादा गरीबी वाली स्थिति तो खत्म ही हो जाएगी। नक्सलियों  के सिर उठाने का इतिहास
सरकारी प्रयास प्रशंसनीय हैं, और ये सकारात्मक भविष्य की ओर इशारा भी करते हैं। परन्तु पिछले 50 वर्षों में दो बार ऐसा हुआ है, जब सरकार ने नक्सल समस्या को खत्म समझा था। 1971 में चारू मजूमदार की गिरफ्तारी और 1972 में इस नक्सली नेतृत्व की मृत्यु के साथ ही इस आतंक का अंत समझा गया था। 1980 में आंध्रप्रदेश में पीपुल्स वार गुरप के बनने के साथ ही नक्सली फिर से सिर उठाने लगेऔर धीरे-धीरे ये कई राज्यों में फैल गए। 1991 में इनका आतंक चरम पर था। उस दौरान भी सरकार ने इनका घोर दमन किया था। इस समस्या का तीसरा सोपान सन् 2000 में चरम वामपंथियों द्वारा पीपुल्स गोरिल्ला आर्मी बनाने के साथ शुरू हुआ। 2004 में माओवादी कम्युनिस्ट पार्टी के साथ हुए इनके गठबंधन ने इनकी जड़ों को बहुत मजबूत कर दिया। 2009 में तत्कालीन प्रधानमंत्री ने पुलिस प्रमुखों को संबोधित करते हुए कहा था कि वामपंथी अतिवाददेश के लिए सबसे बड़ा खतरा है।’ वर्तमान स्थिति माना कि आज सरकार ने नक्सलियों को काबू में करके अपनी शक्ति दिखा दी है। परन्तु नक्सलियों को जन्म देने के कारणों का अंत नहीं हो सका है। 2008 में ही योजना आयोग के विशेषज्ञ समूह ने चेतावनी दे दी थी कि स्वतंत्रता के बाद से ही संसाधनों और अवसरों की उचित पहुँच न होने से समाज के वंचित व पिछड़े वर्गों और समूहों में असंतोष की स्थिति बनती जा रही है। आज भारत में 119 ऐसे अरबपति हैं, जिनकी सम्पत्ति का आकलन डॉलर में करने पर अमेरिका और चीन के बाद भारत का नबर आता है। दूसरी ओर इतनी गरीबी है। भ्रष्टाचार और पारदर्शित के स्तर पर हम विश्व में दो पायदान नीचे ही लुढ़क गए हैं।
वंचितों के असंतोष का एक बहुत बड़ा कारण भ्रष्टाचार है। ऐसा अनुमान है कि माओवादियों ने पूर्वोत्तर क्षेत्रों एवं केरलकर्नाटक, तमिलनाडु के संगम पर अपने अड्डे बनाने शुरू कर दिए हैं। भारत सरकार के पास अब दो ही तरीके हैं। पहलाया तो वह नक्सली आंदोलन को कुचल दे। इस स्थिति में समस्या के नए अवतार के रूप में जन्म लेने की संभावना बन सकती है। दूसरेमाओवादियों से बातचीत करके उनके असंतोष के कारणों को
दूर दिया जाए। एक शक्ति सम्पन्न की ओर से शांति की गुहार को हमेशा प्रशंसनीय समझा जाता है। इसमें सफलता की उम्मीद रहती है। अतः पूर्ण सावधानी बरतते हुए सरकार माओवादियों के साथ एक शांति समझौता कर सकती है।



धन्यवाद ।

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