Skip to main content

सामाजिक न्याय पर एक नजर ।



सार्वजनिक नीति से संबंधित उच्चतम न्यायालय के किसी भी निर्णय में नागरिकों को दो प्रकार की अपेक्षाएं होती हैं। (1) कोई भी निर्णय भारतीय संविधान से सुसंगत हो,और (2) उसके निर्णय से प्रशासन को शक्ति मिलनी चाहिए। न्यायालय के समक्ष अनुसूचित जाति/जनजाति को पदोन्नति में आरक्षण दिए जाने का मामला था, जिसमें उसने उपरोक्क् वर्णित दोनों ही बिन्दुओं पर अपने को सिद्ध नहीं किया। न्यायालय ने 2006 के निर्णय में सरकार द्वारा अनुसूचित जाति/जनजाति के सरकारी कर्मचारियों की संख्या को एकत्रित करने को दरकिनार कर दिया। सरकार ने 1992 में इंदिरा साहनी के मामले में नौ सदस्यीय पीठ के उस फैसले का भी संज्ञान नहीं लिया, जिसमें कहा गया था कि अनुसूचित जाति/जनजाति के मामले में क्रीमी लेयर पर विचारविमर्श का कोई मतलब नहीं है। इंदिरा साहनी के मामले में संवैधानिक प्रावधानों का हवाला देते हुए न्यायालय ने यह स्पष्ट किया था कि अनुसूचित जाति/जनजाति को आरक्षण इसलिए नहीं दिया जा रहा है, क्योंकि वे गरीब हैं, बल्कि इसलिए दिया जा रहा है, क्योंकि वे अपवर्जित या समाज से बाहर रखे गए हैं।


अनुच्छेद 335 में इस वर्ग के आरक्षण को प्रतिनिधित्व के अधिकार के रूप में ही निर्धारित किया गया है, न कि कल्याणकारी कदम की तरह। इस संदर्भ में कोई नागरिक अनुसूचित जाति/जनजाति में अपेक्षाकृत कमजोर लोगों के कल्याण के लिए रोजगार उपलध कराने की अपील कर सकता है। परन्तु इसके लिए क्रीमी लेयर को सामान्य वर्ग में भी अलग करने का मुद्दा उठाया जाएगा। न्यायालय क्या कर सकता है? लिए रोजगार उपलध कराने की अपील कर सकता है। परन्तु इसके लिए क्रीमी लेयर को सामान्य वर्ग में भी अलग करने का मुद्दा उठाया जाएगा। न्यायालय क्या कर सकता है?

अनुसूचित जाति/जनजाति में क्रीमीलेयर के अंतर्गत आ चुके लोगों को आरक्षण की सुविधा से स्वयं बाहर निकलने का विकल्प न्यायालय दे सकता है। वर्तमान में इस वर्ग के पास आरक्षण को अस्वीकार करने का कोई विकल्प नहीं है। किसी भी उम्मीदवार को सरकारी नौकरी के आवेदन के दौरान अपनी जाति लिखने की अनिवार्यता होती है। अनुसूचित जाति/जनजाति लिखते ही वह अपने आप आरक्षित सूची में आ जाता है। इस वर्ग को सामान्य वर्ग सूची में प्रतिस्पर्धा करने की छूट देकर अनुसूचित जाति/जनजाति के तमाम पिछड़े लोगों को आगे आने का मौका दिया जा सकेगा। इससे एक लाभ यह भी होगा कि इस वर्ग के लोग कुल जनसंख्या में उनके अनुपात की तुलना में अधिक पदों की मांग करना बंद कर देंगे। कुलमिलाकर यह कहा जा सकता है कि हमारे देश और उसकी नीतियों को इस बात पर गर्व होना चाहिए कि उसने देश के सबसे पिछड़े जाति वर्ग में से आज ऐसे क्रीमी लेयर का सृजन कर लिया है, जो सामान्य वर्ग के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने के लिए तैयार हो चुका है। इन लोगों ने अपने समुदाय को आम भारतीयों की श्रेणी में खड़ा होने योग्य बना दिया है। यह अपने आप में क्रांतिकारी है। अब इनकी राह में रोजगार और पदोन्नति को लेकर रोड़े अटकाना घातक सिद्ध हो
सकता है। सामान्य वर्ग के लोगों में क्रीमी लेयर को शामिल रखकर चुनाव करने और आरक्षित वर्ग में केवल पिछड़े व गरीबों को रखकर चुनाव करने में कैसी समानता मिल सकेगी? आज का सक्षम वर्गकल पिछड़ा हुआ रहा होगा। यह एक सामान्य सामाजिक-आर्थिक प्रक्रिया है, जो पीढ़ीदरपीढ़ी बदलती जाती है। भारत को अपनी जातिव्यवस्था की कमियों से उपजी सामाजिक विसंगति को दूर करने के लिए संवैधानिक प्रावधानों की आवश्यकता है, और इस हेतु देश के सर्वोच्च न्यायालय से निश्चितता और निरंतरता बनाए रखने की उम्मीद की जा सकती है।



धन्यवाद ।



                          भारत में नक्सलवाद एक  बड़ी समस्या। 








दोस्तों अगर नक्सलवाद की बात करें तो छत्तीसगढ़ हमारे जुबां पर पहले आता है । छत्तीसगढ़ के सुकमा में दिसंबर 2014 में नक्सली हमले में पैरामिलिट्री बल के जवानों की हत्या ने फिर यह सिद्ध कर दिया है कि नक्सलवाद भारत की आंतरिक सुरक्षा के संदर्भ में सर्वप्रमुख और गंभीरत समस्या है। हाल ही में नक्सली हमलों की बढ़ती घटनाओं ने सिद्ध कर दिया है की नक्सली भूतों की शक्ति और क्षमता में तो बढ़ोतरी हुई ही है साथ ही रेड कॉरिडोर नामक उनके प्रभाव क्षेत्र में विस्तार हुआ है।
 भारत में नक्सली आंदोलन का प्रभाव व प्रारंभ दार्जिलिंग के नक्सलबाड़ी गांव से तत्कालीन शोषण वादी और भ्रष्ट सत्ता के विरुद्ध वामपंथी विचारधारा के रूप में हुआ था जिसका नेतृत्व भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के नेता चारू मजूमदार ने किया था । माओत्से तुंग की विचारधारा के समर्थक नक्सलवादी नेताओं ने धीरे-धीरे किसे एक कट्टर आतंकवादी गुट के रूप में परिवर्तित कर दिया। इस क्रम में एक किसान आंदोलन से प्रारंभ होकर नक्सलवाद आज विभिन्न विचारधाराओं और मान्यताओं से पोषित हो रहा है। इसमें माओवादी कम्युनिटी सेंटर पीपुल्स वार ग्रुप सीपीआई और अन्य अनेक क्षेत्र गुटों का सम्मेलन है जो देश के विभिन्न क्षेत्रों से नक्सली विचारधारा का प्रतिनिधित्व करते हैं।

   नक्सली आंदोलन का मूल गरीबी और बेरोजगारी की समस्या में छुपा है। देश में दूरस्थ और पिछड़े इलाकों में स्थिति आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों की समस्याओं और शोषणकारी और भ्रष्टाचार आधारित समस्या ने नक्सलवाद को पोषित किया है। वर्ष 2006 में d   बंधोपाध्याय की अध्यक्षता में गठित कार्यबल ने देश की सामाजिक आर्थिक और राजनीतिक तथा सांस्कृतिक आधारों पर दलित और पिछड़े व आदिवासी समाजों के पिछड़ेपन के नक्सलवाद की उत्पत्ति का कारण बताया था। अर्थात गरीबी और शोषण नक्सलवाद के मुख्य कारण है।


    नक्सलवाद ने अपने विकास क्रम में गरीबी और बेरोजगारी के माहौल में सरकारी नीतियों का पुरजोर विरोध किया है। इसके लिए वे गोरिल्ला युद्ध पद्धति पर आधारित रणनीति के सहारे आतंकी घटनाओं को अंजाम देते हैं जिसमें सैन्य बल पर हमले प्रतिष्ठित लोगों के अपहरण फिरौती हत्याएं आदि शामिल हैं।राष्ट्रीय संपत्ति को नुकसान पहुंचाना भी नक्सली हमलों की प्रमुख विशेषता रही है। नक्सली अपने प्रभाव वाले क्षेत्रों में समानांतर सरकार भी चला रहे हैं जिनमें टैक्स वसूली के नियम बनाए जाते हैं और अदालतें लगाकर उन के फरमान को ना मानने वाले के खिलाफ सजा सुनाई जाती हैं। अपने साथियों को छुड़वाने के लिए स्थानीय पुलिस थानों पर हमला उनके लिए आम बात है। कभी-कभी दूरस्थ या अति पिछड़े इलाकों मैं स्थिति प्रशासनिक भवन और जेलों की भी नक्सली अपना निशाना बनाते दिखते हैं।
    
   नक्सलवाद की समस्या के कारण देशों को मानवीय और आर्थिक दोनों ही क्षेत्र में नुकसान हो रहा है। एक कृषक आंदोलन के रूप में प्रारंभ नक्सलवाद आज दलित व आदिवासी समूहों के हितों की अनदेखी करता दिखाई देता है।
स्वार्थ परक हितों को पूरा करने के लिए या दबे कुचले आम नागरिकों को भी और अत्याचार का निशाना बनाने से नहीं चुप रहा है ।इसके साथ ही छत्तीसगढ़ में कांग्रेसी नेताओं पर किए गए हम लोग को नक्सली हिंसा की पराकाष्ठा माना जा सकता है। हालांकि यह कहना भी उचित होगा कि नक्सली हिंसा की आवृत्ति निरंतर बढ़ती ही जा रही है। वर्ष 2012 में सुकमा के जिलाधिकारी एलेक्स पाल मेनन का अपहरण भी इसी नक्सली उत्तेजना का परिणाम थी। यह सभी घटनाएं सिद्ध करती है कि नक्सलवाद भारत में निरंतर अपनी जड़े फैलाता ही जा रहा है जोकि हमारे देश के लिए सही नहीं है।

      यह सही है कि नक्सलवाद की समस्या से निपटने के लिए सरकारी स्तर पर कोशिश बहुत की गई किंतु विभिन्न एजेंसियों के बीच आपसी तालमेल की कमी और राजनीति व प्रशासनिक दृढ़ इच्छा शक्ति के अभाव में समस्या के निराकरण की अपेक्षित लक्ष्य की प्राप्ति को दूर कर दिया है। विकास के नाम पर भेजा गया पैसा बीच में ही मध्यमवर्गीय और प्रशासनिक संरचना की भेंट चढ़ जाता है तथा भ्रष्टाचार इसे अपने लक्ष्य से दूर कर देती है। ऐसे पिछड़े क्षेत्र में संपन्न होने वाला विकास कार्य केवल कागजी ही दिखाई देता है ।नेताओं और पुलिस की मिलीभगत से कई बार चुनाव में नक्सलियों की भागीदारी भी सुनिश्चित की जाती है।ऐसी स्थिति में केंद्रीय बलों द्वारा नक्सल विरोधी चलाए जाने वाले ऑपरेशन में ज्यादातर असफल हो जाते हैं । भौगोलिक क्षेत्रों की अनभिज्ञता भी बाहरी सुरक्षा बालों के रास्ते में औरत की भांति दिखती है जिसमें स्थानीय पुलिस द्वारा ही सही जानकारी न दिया जाना भी शामिल है।
    
       नक्सली हिंसा को रोकना और नक्सली समूह को देश की मुख्यधारा से जोड़ना आज विकास और आंतरिक सुरक्षा की दृष्टि से प्राथमिक और अपरिहार्य आ सकता है। इसके लिए राष्ट्रीय स्तर पर राज्यों के साथ एक एकीकृत व्यवस्था की स्थापना और केंद्र व राज्य पुलिस संगठनों के बीच तालमेल जरूरी है। इसके साथ ही पुलिस और न्याय व्यवस्था में सुधार भी आवश्यक है जिससे कि गरीबों को उनका हक मिल सकें। बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा विकास के नाम पर अवैध रूप से किए जा रहे भूमि अधिग्रहण संबंधी गतिविधियों की निगरानी भी आम किसानों के हित में है। सबसे अधिक जरूरी भ्रष्टाचार की समाप्ति है जिससे की अशिक्षित और गरीब लोग को उनका हक मिल सकें। किंतु इसके लिए राजनीतिक और प्रशासनिक इच्छाशक्ति एक आवश्यक पूर्व   शर्त है ।
 
     यदि देखा जाए तो नक्सली समस्या का समाधान भारत के विकास से जुड़ा है। यदि सभी क्षेत्रों का सामान विकास संभव हो जाए तो संभवत: यह समस्या भी समाप्त हो जाए क्योंकि लोगों की गरीबी और बेरोजगारी ही इस प्रकार की हिंसा वादी समस्याओं का मूल कारण है।



धन्यवाद ।

Comments

Popular posts from this blog

बच्चों को शारीरिक दंड देना कहा तक उचित और अनुचित।

यह जरूरी नहीं कि हम दंड के माध्यम से ही किसी समस्या का समाधान करें हां लेकिन यह कुछ हद तक हम ऐसा कर सकते हैं । बच्चे का दिमाग बचपना अवस्था में बहुत कोमल होता है। हमें दंड देते समय वह सारा प्रयास करना चाहिए कि बच्चे डरे नहीं, बल्कि उसे समझे क्योंकि डर बच्चे को कमजोर बना सकती है।घर में माता पिता और स्कूलों में अध्यापकों को इस बात का ध्यान रखना चाहिए।हमें समझना चाहिए कि यदि कोई बालक किसी भी प्रकार की गलती करता है तो वह उसकी उम्र है और इस उम्र में बच्चे ऐसा करते हैं और जब वह ऐसा करें तो हमें उन्हें प्रेम से समझाना चाहिए और उन्हें बताना चाहिए कि यह अमुक वस्तु आपने तोड़ दिया है सोचिए फिर आप कैसे खेलेंगे तो कल खेलना है नहीं तो मैं दूसरी ला दूंगा लेकिन इसे दोबारा मत तोड़ना, कहने का अर्थ बच्चे को ज्यादातर उसकी गलती पर समझाएं और इस तरह समझाए कि उसे यह न लगे कि आप उस पर नाराज है या गुस्से में समझा रहे हैं।इस तरह से वह समझेगा भी और उसके बुद्धि का विकास भी होगा और आने वाले जीवन में भी वह बहुत सी समस्याओं का समाधान स्वयं कर सकेगा और हम एबी जानते हैं कि संसार में सुख कम और दुख ज्यादा है तो...

भारत में सांप्रदायिकता एक बड़ी समस्या।

एक विशेष विचार भाव या पूजा पद्धति को मानने वाले समूह को संप्रदाय के नाम से जाना जाता है। मेरे कहने का आशय यह है की किसी विशेष मत या विचार के लोगों द्वारा समग्र राष्ट्र के प्रति निष्ठावान ना होकर केवल अपने मत विचार के प्रति अति निष्ठावान होना ही संप्रदायिकता है। जब विविध संप्रदाय अपने प्रति अंध भक्ति रखकर दूसरे संप्रदायों से घृणा  करने लगते हैं तो यही अपने आगे की क्रम में संप्रदायिकता की भावना को पैदा करता है दूसरे शब्दों में संप्रदाय का असहिष्णु उठना संप्रदायिकता है ।     प्राचीन काल में विभिन्न समय पर भिन्न-भिन्न स्थानों से लोगों के प्रवास ने भारतीय संस्कृति को समृद्ध किया है।  शताब्दियों के अंत मिश्रण आत्मीयता तथा समायोजन ने भारतीयों के मानव जाति एकरूपता को विकास किया है। भारतीय भाषाओं का विकास भी विभिन्न मानव जाति तत्वों से हुआ है। वे सैकड़ों वर्षो तक एक दूसरे के संपर्क में रहे, जिससे हमारी मुख्य भाषाई समूह का जन्म हुआ। भारत के संविधान द्वारा मान्य 22 भाषाओं सहित 1652 मान्य भाषाएं यहां की आश्चर्यजनक विविधता के प्रमाण हैं।  भारत जिसे इ...