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Showing posts from October, 2020

साहित्य और समाज

ज्ञान के विभिन्न स्रोतों का सम्यक संकलन साहित्य है । किसी भी देश की सभ्यता एवं संस्कृति का स्पष्ट निरुपण उसके साहित्य में मिलता है । किसी भी देश का उत्कृष्ट साहित्य वहाँ का सुसभ्य | एवं सुसंस्कारित समाज का परिचायक होता है । साहित्य में जिस सुन्दर समाज की कल्पना की जाती है , उसे वास्तविकता में ढालना समाज का कर्तव्य होता है । ध्यातव्य हो कि साहित्य रूपी भवन का निर्माण समाज के आधार पर ही होता है । निश्चय ही साहित्य | सर्वथा देशकालिक होता है । सामाजिक परिस्थितियाँ जैसी होगी , उस काल के साहित्य का स्वरूप भी तद्नुरुप होगा । आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के शब्दों में , " ज्ञान राशि के संचित कोष का नाम साहित्य है । " बाबू श्याम सुन्दर दास के शब्दों में , “ सामाजिक मस्तिष्क अपने पोषण के लिए जो भाव सामग्री निकालकर समाज को सौंपता है उसी के संचित कोष का नाम साहित्य है । " उपन्यास सम्राट प्रेमचन्द्र ने साहित्य को जीवन का संस्कार मानते हुए लिखा है कि “ साहित्य हमारे जीवन को स्वाभाविक और सुन्दर बनाता है । दूसरे शब्दों में उसकी बदौलत मन का संस्कार होता है । यही प्रमुख उद्देश्य है । ...

भारत में सूचना क्रांति : संभावनाएं और सीमाएं

वैज्ञानिक प्रगति ने निरन्तर नयी विधियों और माध्यमों का विकास किया । पहले टेलीग्राफ , टेलीफोन व बेतार रेडियो और अब टेलीविजन , फैक्स , ई - मेल , सुपर कम्प्यूटर , रेडियो पेजर , सेलुलर फोन , वीडियो टेलीफोन आदि ने संचार - जगत में नयी क्रान्ति का सूत्रपात किया है । बड़े पैमाने पर सूचना का संरक्षण , पुनप्ति , सम्प्रेषण तथा पुर्नव्यवस्था को सूचना - क्रान्ति कहते हैं । सूचना - क्रान्ति की शुरूआत अमेरिका से हुई । वैसे भारत में संचार की विकास यात्रा कभी धीमी कभी तेज रही है । रफ्तार की दृष्टि से 90 का दशक अत्यंत ही तीव्र माना गया है । इसलिए इसे संचार - क्रान्ति का युग कहा जा रहा है । 17 वीं शती एवं 18 वीं शती जहाँ साम्राज्यवादी शासन प्रणाली की साक्षी रही है वहीं 19 वीं शती में औद्योगीकरण का बोलबाला रहा है । समय के साथ परिवर्तन हुआ , नवीन अविष्कार हुए , जिन्होंने सूचना क्रान्ति के मार्ग को प्रशस्त किया । यह भविष्य के लिए प्रगति का पथ है । 21 वी शती सूचना क्रान्ति की शती है । आज कम्प्यूटर , ई - मेल , ई - कामर्स , इन्टरनेट , साइबर सेन्टर आदि का जमाना है । भारत के दरवाजे पर भी इसकी दस्तक सुनी जा सकती ...

भारत में पर्यटन

मानव सृष्टि के आरम्भ से ही एक गतिशील प्राणी रहा है । कालांतर में सभ्यता के विकास के साथ - साथ उसमें नई चेतना का अभ्युदय हुआ । वह अपनी महत्वपूर्ण आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए ही लम्बी दूरी की यात्रा करने लगा । दो स्थानों के बीच यातायात के साधनों के विकसित हो जाने के कारण जनसाधारण को छोटी - छोटी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए ज्यादा दूरी की यात्रा आवश्यक नहीं , रह गयी । मनुष्य द्वारा मनोरंजन , अर्थोपार्जन तथा सांस्कृतिक आदान प्रदान के लिए एक स्थान से दूसरे स्थान के भ्रमण को एक शब्दों में ‘ पर्यटन ' की संज्ञा दी जाती है । पूर्व में पर्यटन मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति का साधन था , किन्तु जहां तक वर्तमान का विषय है यह अर्थोपार्जन और मनोरंजन का साधन बन गया है और इसे उद्योग का दर्जा प्रदान कर दिया गया है । भारत ने तो पर्यटन के क्षेत्र में विश्व में अपना महत्वपूर्ण स्थान बना लिया है । द्वितीय विश्वयुद्ध के उपरान्त पर्यटन एक महत्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय उद्योग के रूप में विकसित हुआ है । जब किसी देश से कोई व्यक्ति अन्य देश में आता है , तब उसके कई फायदे हो सकते हैं । प्रथम तो यात्रा आधारित मनोरंजन और...

बाल मजदूरी: समस्याएं एवं समाधान

प्रायः हर भाषा , संस्कृति और देश में यह धारणा सामान्य रूप से पाई जाती है कि बच्चे राष्ट्र के भावी कर्णधार होते हैं , आज के बच्चों में हम आने वाले कल को देख सकते हैं । इस सम्बन्ध में महत्वपूर्ण है कि यदि कोई देश बाल मजदूरी की समस्या से जूझ रहा है तो उसका भविष्य निश्चित ही अंधकारमय होगा । इसके साथ ही बच्चों का भविष्य भी खराब होगा । ऐसी स्थिति में हम उस देश के अच्छे भविष्य की कल्पना कैसे कर सकते हैं ? आज विश्व के अमीर या गरीब , विकसित या विकासशील सभी देशों में बच्चों के नन्हें हाथों का प्रयोग धनोपार्जन के लिए किया जाता है । संयुक्त राष्ट्र अंतर्राष्ट्रीय बाल संकट कोष द्वारा हाल में जारी की गई रिपोर्ट के अनुसार विश्व भर में 24.6 करोड़ बच्चे बाल श्रमिक के रूप में कार्य करते हैं , इनमें से 15.2 करोड़ केवल एशिया में हैं । उल्लेखनीय है कि भारत में विश्व के सर्वाधिक बाल श्रमिक हैं । यह एक अत्यंत सोचनीय प्रश्न है । चूंकि भारत एक युवा राष्ट्र है इसलिए यह स्थिति और भी गंभीर है क्योंकि यही बच्चे कल ऐसे युवा के रूप में सामने होंगे जिनको संसाधन की दृष्टि से हीन माना जायेगा । 1986 के बाल - श्रम अधिनिय...

लोकपाल बनाम जनलोकपाल

स्वतंत्रता के लगभग 6 दशक पूरे होने के बाद भारतीय संसदीय लोकतंत्र के समक्ष अनेक समस्यायें उठ खड़ी हुई हैं जिनमें भ्रष्टाचार का मुद्दा सर्वाधिक ज्वलन्त रूप में सामने आया है । जहाँ एक तरफ सम्बन्धित व्यवस्था के परिप्रेक्ष्य में अरब जगत में जन - विद्रोह की लहर उठी उसी के साथ - साथ विश्व भर में व्यवस्था परिवर्तन का स्वर मुखरित होने लगा । इसने भारत में भी स्वीडिश ओम्बुड्समैन के भ्रष्टाचार से मुक्ति पाने के मुख्य अस्त्र के विकल्प पर वर्तमान में | खुली बहस को जोरदार हवा दी है । टीम अन्ना और उनके सहयोगियों ने अपने जनलोकपाल को सरकारी लोकपाल के दावे के रूप में मुखर किया है । वस्तुतः दोनों लोकपाल प्रारूपों और उनकी प्रभावशीलता पर विचार करना महत्वपूर्ण विषय है । यदि समय के पिछले पड़ावों पर दृष्टि डाली जाये तो इंगित होता है कि भारत में लोकपाल के गठन पर प्रयास 6 वें दशक के आखिरी वर्षों में ही प्रारम्भ हो गये थे । इसी उद्देश्य से प्रथम प्रशासनिक आयोग के गठन की अनुशंसा की गई । इसके अनुसरण में लोकपाल विधेयक सर्वप्रथम चौथी लोकसभा के कार्यकाल के दौरान 1968 में प्रस्तुत किया गया , जहाँ यह 1969 में लोकसभा से ...