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भारत में सांप्रदायिकता एक बड़ी समस्या।


एक विशेष विचार भाव या पूजा पद्धति को मानने वाले समूह को संप्रदाय के नाम से जाना जाता है। मेरे कहने का आशय यह है की किसी विशेष मत या विचार के लोगों द्वारा समग्र राष्ट्र के प्रति निष्ठावान ना होकर केवल अपने मत विचार के प्रति अति निष्ठावान होना ही संप्रदायिकता है। जब विविध संप्रदाय अपने प्रति अंध भक्ति रखकर दूसरे संप्रदायों से घृणा  करने लगते हैं तो यही अपने आगे की क्रम में संप्रदायिकता की भावना को पैदा करता है दूसरे शब्दों में संप्रदाय का असहिष्णु उठना संप्रदायिकता है ।
    प्राचीन काल में विभिन्न समय पर भिन्न-भिन्न स्थानों से लोगों के प्रवास ने भारतीय संस्कृति को समृद्ध किया है।  शताब्दियों के अंत मिश्रण आत्मीयता तथा समायोजन ने भारतीयों के मानव जाति एकरूपता को विकास किया है।
भारतीय भाषाओं का विकास भी विभिन्न मानव जाति तत्वों से हुआ है। वे सैकड़ों वर्षो तक एक दूसरे के संपर्क में रहे, जिससे हमारी मुख्य भाषाई समूह का जन्म हुआ। भारत के संविधान द्वारा मान्य 22 भाषाओं सहित 1652 मान्य भाषाएं यहां की आश्चर्यजनक विविधता के प्रमाण हैं।
 भारत जिसे इंडिया के नाम से भी जाना जाता है, एक बहुत से धर्म के लोगों वाला देश है। यहां हिंदू ,मुसलमान ,ईसाई ,बौद्ध जैन ,सिक ,पारशी ,यहूदी तथा बहुत बड़ी संख्या के अन्य धर्म के लोग हैं। जिन्होंने भारत को एक ऐसा समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का भंडार बना दिया है जैसा संसार में शायद ही कभी देखा हो। पंथ्यों संप्रदायों भाषाओं तथा संस्कृतियों की विभिन्नता के बावजूद भारत के लोग मानवता सभी धर्मों के प्रति आदर और सहिष्णुता जैसे मौलिक विचारों के प्रति निष्ठावान रहे हैं जो इस राष्ट्र को पंथनिरपेक्षता का एक घर बनाने में सहायक हुए हैं।
भारत एक स्वतंत्र राजनीतिक इकाई है। संपूर्ण देश एक ही संविधान द्वारा शासित होता है। अंग्रेजों ने भारत में फूट डालो और शासन करो की नीति के आधार पर शासन किया और भारतीयों में कई प्रकार के तनाव पैदा किए सांप्रदायिकता जातिवाद क्षेत्रवाद तथा भाषावाद जैसी वर्तमान समस्याओं की उत्पत्ति औपनिवेशिक पृष्ठभूमि से होती है। स्वतंत्रता से पूर्व भारत के लोग विदेशी शासन से मुक्ति पाने तथा भारत को स्वतंत्र कराने के लिए संगठित हुए। गांधी जी के अहिंसा के सिद्धांत पर चला स्वतंत्रता आंदोलन विश्व की एक अनोखा घटना है। सभी देशभक्त भारतीयों में जाति संप्रदाय धर्म तथा भाषा संबंधी मान्यताओं से ऊपर उठकर मातृभूमि को स्वतंत्र कराने के लिए कुर्बानियां दी।
यधपि की स्वतंत्रता संग्राम के दौरान विद्वान एकता तथा सद्भाव स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात कमजोर पड़ गए हैं। आज हमें हमारी सामाजिक शांति और सौहार्द को भंग करने वाले जातिगत झगड़े संप्रदायिक दंगे क्षेत्रीय हिंसा और वंशानुगत शत्रुता तथा तुष्टीकरण की राजनीति देखने को मिलती है। जातिवाद तथा सांप्रदायिकता सामाजिक तनाव तथा वर्गी हिंसा पैदा करने वाले सबसे सशक्त स्रोत हैं , जो राष्ट्रीय एकता सामाजिक सद्भाव पंथनिरपेक्षता तथा लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए गंभीर चुनौती है।
संप्रदायिकता बहुत घातक रही है, जिसके कारण 1947 में देश का विभाजन हुआ। इस दौरान हजारों निर्दोष लोग मारे गए। अपने घरों से विस्थापित हुए लोग शरणार्थी बन गए। इस सांप्रदायिक नरसंहार ने बच्चों को आना तथा स्त्रियों को विधवा बना दिया।
 स्वतंत्रता के उपरांत 70 वर्ष से अधिक समय बाद भी भारत सांप्रदायिकता की समस्या पर नियंत्रण नहीं कर पाया है। संप्रदायिकता के साथ साथ आतंकवाद तथा पृथक वाद हमारी राष्ट्रीय एकता तथा अखंडता के लिए खतरा बने हुए हैं राजनीति के साथ धर्म को जोड़ने से हमारे पंथनिरपेक्ष लोकतंत्र को झटका लगा है। संप्रदायिक हिंसा तथा रक्त पार्क से सभी के मन में असुरक्षा की भावना पैदा होती है। भारत डर आतंक तथा संदेह से पीड़ित हो ना सहन नहीं कर सकता।

भारत की धर्म  अधिकता में हिंदू का बहुमत है तथा अन्य धार्मिक समुदाय अल्पमत में है जिसमें मुस्लिम समुदाय सबसे बड़ा है । प्रायः जब भी एक धार्मिक समुदाय या वर्ग किसी भी कारण से दूसरे का विरोध करता है तो सांप्रदायिक तनाव उभरने लगता है किसी भी समुदाय द्वारा अपने निहित  हितों की पूर्ति तथा अपनी पहचान को प्रोत्साहन देने के प्रयासों से सामाजिक तनाव पैदा हो जाता है। इसी संप्रदाय पागलपन व उन्माद में व्यक्ति अपने ही बंधुओं का शत्रु बन जाता है। यह आवश्यक नहीं है कि एक धार्मिक व्यक्ति संप्रदायिक हो, अपितु संप्रदायिकता अवश्य ही धर्म विरोधी होता है। हिंदू मुसलमान सिख अथवा अल्पमत या बहुमत की संप्रदायिकता की बात करना ना केवल भ्रामक है बल्कि खतरे से भी खाली नहीं है।
   कट्टरपंथी अपने धार्मिक समुदाय को अन्य धर्मों की तुलना में वरिष्ठ तथा पृथक दिखाने का प्रयास करते हैं ।वह सामान्य हितों की अपेक्षा अपने हितों की अधिक महत्व देते हैं। प्रत्येक नागरिक को व्यक्तिगत रूप से नहीं अपितु सांप्रदायिक दृष्टि से देखते हैं। इस प्रकार वे अपनी अलग पहचान  बनाए रखकर दूसरे की अपने से तथा अपनी दूसरों से दूरी बनाए रखते हैं। या विचारधारा समाज को विघटन की ओर ले जाती है।

संप्रदायिकता की कुत्सित भावना कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक सर्वत्र किसी न किसी रूप में अवश्य दिखाई देती है। इसके भयंकर रूप धारण करने ही देश का एकता अखंडता खतरे में पड़ जाता है। राष्ट्र विरोधी तत्वों को खुला अवसर मिल जाता है ।मानव जाति का रक्त पिपासु बन जाता है ।प्रशासन द्वारा संप्रदायिकता की अग्नि को बुझाने में असफल होने पर कर्फ्यू लगा दिया जाता है। इससे निर्धन लोग अत्यधिक प्रभावित होते हैं। लोगों की अधिकता छीन जाती है।

भारत का एक धर्मनिरपेक्ष देश होने के कारण यहां पर संप्रदायिकता का बना रहना इसकी धर्मनिरपेक्षता पर निश्चय ही एक प्रश्न चिन्ह लगता है। अतएव यथाशीघ्र उन्मूलन अनिवार्य है।
केवल भारी रूप से स्थिति पर काबू रखना ही उपयुक्त नहीं है। अभी तो इसके लिए निम्न बातों पर ध्यान देना आवश्यक है-

सर्वप्रथम लोगों की मानसिकता में परिवर्तन लाना होगा

सांप्रदायिकता फैलाने वाले लोगों को कड़े से कड़े दंड का प्रावधान करना होगा ताकि अन्य लोग भी इससे सबक लें

सरकार को चाहिए कि वह तुष्टीकरण की नीति का परित्याग कर एवं आवश्यक सुविधाएं प्रदान कर अल्पसंख्यकों की मनोवृति को दूषित ना होने दें।

विभिन्न उत्सव विशेष अवसरों पर सर्व धर्म सम्मेलन के माध्यम से जनता में परस्पर सद्भाव की भावना जागृत करना।

जनसंचार के माध्यमों द्वारा संप्रदायिकता विरोधी कार्यक्रम को कार्यान्वित करना।
अगर हम पूरे लेख के निष्कर्ष की बात करें तो समाज के पटल पर यह तथ्य उभर कर आता है कि जब तक हम परस्पर अलगाव की भावनाओं समाप्त नहीं कर सकेंगे तब तक इस अभिशाप से मुक्ति मिल ना निश्चय ही बड़ा कठिन है। अतः इसके लिए हमें आज विवेक के साथ सजग होने की आवश्यकता है।




धन्यवाद ।

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