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राजनीति एवं प्रशासन में भ्रष्टाचार ।


भारतीय राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था में नैतिकता एवं ईमानदारी की उपस्थिति खत्म होती जा रही है। इसी कारण 20 वीं सदी का अंतिम दशक यदि भारतीय राजनीति में घोटाला युग कहा जाए तो अतिशयोक्ति ना होगी। भ्रष्टाचार आज आवश्यक एवं साधारण बात हो चुकी है।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी भ्रष्टाचार की समस्याओं को देश के लिए एक बड़े खतरे के रूप में वर्णित किया है। भ्रष्टाचार की समस्या प्राचीन काल से ही विद्यमान रही है।प्राचीन लोक कथाओं से लेकर ऐतिहासिक दस्तावेजों तक भ्रष्टाचार एक चर्चित समस्या रही है। सल्तनत युग, मुगल एवं राजशाही व्यवस्थाओं में भ्रष्टाचार के पर्याप्त साक्ष्य मौजूद हैं। ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा अपने कर्मियों को कम वेतन प्रदान किए जाने के कारण उनके अधिकांश कर्मी किसी न किसी रूप में भ्रष्टाचार के कीचड़ में फंसे थे। देश में आजादी के बाद भारत में प्रचार बहुत तेजी से बढ़  है। किसी भी क्षेत्र में देखिए लोगों के मन में या धारणा बन गई है कि बिना रिश्वत दिए कोई भी कार्य हो ही नहीं सकता।आज भ्रष्टाचार हमारी राजनीति एवं प्रशासनिक व्यवस्था में कुल मिल गया है।
      विश्व के धरातल पर प्रचार का अध्ययन करने वाली संस्था ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार भारत और विश्व के 178 भ्रष्टतम देशों की सूची में 94 स्थान पर है । 75% लोग भारत में किसी न किसी रूप में भ्रष्टाचार का सामना करते हैं। कॉमनवेल्थ गेम के घोटाले या 2G स्पेक्ट्रम घोटाला या महाराष्ट्र हाउसिंग सोसायटी का घोटाला या उड़ीसा में वेदांत विश्वविद्यालय से जुड़े भूमि संबंधी घोटाले हो या मनरेगा संबंधी घोटाले या हाल ही में राफेल डील पूरा भारतीय समाज में नई नई फसल के आयाम खुलते जा रहे हैं। इस प्रक्रिया ने भ्रष्टाचार को एक बड़ी सामाजिक बुराई के रूप में खड़ा कर दिया है।वस्तुतः भ्रष्टाचार देश की प्रशासनिक व्यवस्था के सामने एक कठिन चुनौती है। यदि कि समाज में नैतिक मूल्यों में कमी के बावजूद भी अच्छे लोगों की कमी नहीं है, किंतु धीरे धीरे इनके ऊपर नकारात्मक प्रभाव हावी हो रही हैं। व्यवस्था की उदासीनता  ऐसे लोगों की निराशा रूप अंधकार में धकेल रही है।
भ्रष्टाचार में लिप्त व्यक्तियों को ना तो कानून का डर है और ना ही समाज का भ्रष्टाचार मुक्त समाज के निर्माण के लिए आम जनता को जागरूक बनना होगा जो भी व्यक्ति भ्रष्टाचार में लिप्त पाया जाता है या जिसके पास बेहिसाब काली संपत्ति है उसे सामाजिक रूप से बहिष्कृत किया जाना चाहिए।
कार्यालयों में रिश्वत लेना और देना अपराध है का केवल बोर्ड टांग देने का भ्रष्टाचार के विरुद्ध सप्ताहिक अभियानों से कुछ भी प्राप्त नहीं होगा। इससे मुक्ति पाने का स्थाई समाधान निकालना अति आवश्यक है। वस्तुतः भ्रष्टाचार के समूल विनाश संपूर्ण समाज राजनीति एवं प्रशासनिक व्यवस्था को दृढ़ संकल्पित होकर एकजुट के साथ पहल करनी होगी, तभी इस भ्रष्टाचार को जड़ से मिटाया जा सकेगा। इसके लिए अधोवर्णित सुझाव पर गहन विचार विमर्श कर समाधान की दिशा तय की जा सकती है।
   वर्तमान हालात में यह आवश्यक हो गया है कि भ्रष्टाचार को उजागर करने की दिशा में साहस उतारने वाले लोगों को समाज प्रशासन पहचाने और और प्रमुखता दे। भ्रष्टाचार को लेकर दो हल्ला करने के स्थान पर दृढ़ राजनीतिक एवं प्रशासन इच्छाशक्ति एक पूर्व शर्त है।
    नैतिक मूल्यों में गिरावट भ्रष्टाचार का एक महत्वपूर्ण कारण है। बरसे शार्को सत्य और निष्ठा और आधारभूत मानवीय मूल्यों से जोड़ना होगा।
    लोक सेवा गारंटी कानून भ्रष्टाचार को समाप्त करने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है इससे प्रशासनिक तंत्र में चुस्ती आएगी और वर्षा कम होगा।
     बाजार में संलग्न व्यक्तियों को इतना कठोर दंड दिया जाना चाहिए कि उसके मन में भय पैदा हो कि जब पकड़े जाएंगे तो भ्रष्ट संसाधनों से इकट्ठा की गई संपत्ति  दंडित किए जाने की तिथि से मूल्य सहित वापस ले ली जाएगी ।
   एक स्वतंत्र निष्पक्ष एवं उच्च अधिकार संपन्न लोकपाल संस्था का गठन आवश्यक है जो कि राजनेताओं और अधिकारियों की प्रत्येक गतिविधि पर दृष्टि रखें।
   शिक्षा तंत्र को जागरूक गुणात्मक और मूल्यांकन बनाकर समाज में शुरू से ही भ्रष्टाचार के विरुद्ध वातावरण बनाए जाए और बच्चों को भ्रष्टाचार मुक्त की पाठ पढ़ाई जाए।
   भ्रष्टाचार पर नियंत्रण पाने हेतु सभी राजनीतिक दलों को मिलजुलकर प्रयास करने की परंपरा विकसित करनी होगी।
   प्रशासन में पारदर्शिता संवेदनशीलता एवं जवाब देता मात्र सैद्धांतिक नहीं हो बल्कि व्यावहारिकता का परिचय देकर भ्रष्टाचार को समाप्त किया जा सकता है।
  भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो में एक मजबूत नीर क्षीर विवेक तंत्र का समावेश होना चाहिए।
 भ्रष्टाचार को समाप्त करने हेतु एक जिम्मेदार एवं नागरिक न्यायपालिका ज्यादा कारगर सिद्ध हो सकती है।
  न्यायिक प्रक्रिया में विलंब यात्रा को नकारने के जैसा है भ्रष्टाचार से संबंधित मामलों में प्रशासनिक कार्यवाही में होने वाला विलंब त्वरित न्याय प्राप्ति में बाधा उत्पन्न करता है और और भ्रष्टाचार पर रोक लगाने में बाधा डालता है अता न्यायिक निर्णयों पर शीघ्र कार्यवाही अपरिहार्य है।

भ्रष्टाचार रूपी आग के विस्तार को रोकने के बेदाग छवि वाले अधिकारियों से युक्त संस्थान ही सक्षम हो सकता है।
अगर निष्कर्ष की बात करें तो बस भ्रष्टाचार सिर्फ शोर शराबे से नहीं बल्कि दृढ़ इच्छाशक्ति से समाप्त हो जाएगा ।
निश्चित रूप से भ्रष्ट तंत्र की मरम्मत किए बिना और दोषियों को कठोर सजा दिए बिना भ्रष्टाचार रूपी दुष्चक्र को समाप्त करना आसान काम नहीं है। सामाजिक प्रशासनिक एवं राजनीति व्यवस्था में नैतिकता, सुचिता पारदर्शिता, भ्रष्टाचार पर कड़े निर्णय लेकर ही इस पर रोक लगाई जा सकती है। भ्रष्टाचार को जड़ से समाप्त करने की दिशा में एक गहन चिंतन मनन की आवश्यकता है।
व्यावहारिक परिस्थितियों को देखते हुए अनियंत्रित भ्रष्टाचार पर प्रभावी रोकथाम हेतु एक ऐसे सशक्त निकाय की जरूरत है जिसके पीछे संवैधानिक सकती हो इस निकाय में ऐसे ईमानदार, कर्तव्य निष्ठ ,संवेदनशील ,साहसी एवं प्रतिबंध  अधिकारियों को नियुक्त किया जाए जिनका पूर्व सेवा काल पूर्णता स्वच्छ छवि का रहा हो।
धन्यवाद ।




भारत में अंतर्राज्यीय जल विवाद पर एक नजर ।



भारत जैसे विशाल देश में संघीय शासन प्रणाली का प्रयोग विविधता और एकता में सामंजस्य बनाए रखने के लिए किया गया । भारतीय संघ व्यवस्था में राज्यों के मध्य के अनेक विवाद पाए जाते हैं । संविधान में राज्यों के पुनर्गठन का अधिकार संसद को सौंपा है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 3 में स्पष्ट वर्णन किया गया है कि संघ सरकार द्वारा राज्यों के नाम भूभाग और सीमा में परिवर्तन किया जा सकता है। इसके लिए राज्य विधानसभाओं से सहमति ली जाती है लेकिन यह संघ सरकार के लिए बाध्यकारी नहीं है। भारत में नदी जल विवादों को सुलझाने के लिए अनुच्छेद 262 का प्रावधान मौजूद है।जिसके अनुसार नदी जल विवाद उच्चतम न्यायालय के आरंभिक अधिकारिता से बाहर होंगे संसद के अनुच्छेद 262 के अनुसार नदी जल विवादों को सुलझाने के लिए अंतरराष्ट्रीय जल विवाद अधिनियम 1956 का निर्माण किया इस अधिनियम के अंतर्गत राज्य सरकार किसी भी विवाद को सुलझाने के लिए संघ सरकार से न्यायाधिकरण की स्थापना का अनुरोध कर सकते हैं तथा न्यायाधिकरण द्वारा दिया गया निर्णय विवादरत पक्षों को मानना होगा । सरकारिया आयोग ने भी राज्यों के मध्य जल विवाद को सुलझाने के लिए एक विशेष समय सीमा में संघ सरकार द्वारा निर्णय लिए जाने की बात कही है। परंतु राज्यों के मध्य अभी भी विवाद कायम है विचारकों के अनुसार इस संदर्भ में संघ सरकार की शक्तियां अभी भी अपर्याप्त है किंतु इन विवादों को सुलझाने के लिए संघ के द्वारा बाध्यकारी संख्या का प्रयोग नहीं किया जा सकता न्यायाधिकरण के निर्माण को लागू करना राज्यों का अधिकार है इस समस्या के समाधान के लिए बने पंचाट ने नदी जल विवाद को संघ सरकार को सौंपने की अनुशंसा की । अतः नदी जल विवादों को संघ सूची या समवर्ती सूची में सम्मिलित करने का समर्थन किया गया क्योंकि अनुच्छेद 262 के प्रावधान के अनुसार न्यायाधिकरण की अस्थापना राज्यों की सहमति के पश्चात ही होती है। उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि भारतीय संघ व्यवस्था में शक्तिशाली संघ राष्ट्रीय हितों और आवश्यकताओं के अनुरूप है जल विवादों से जुड़े कुछ भूमि विवाद भी हैं जिनमें बेलगांव को लेकर महाराष्ट्र और कर्नाटक के मध्य अभी भी विवाद है 1956 के राज्य पुनर्गठन के बाद बेलगांव कर्नाटक का भाग बना दिया गया लेकिन महाराष्ट्र अभी भी उसे प्राप्त करने के लिए आंदोलन कर रहा है बेलगांव के बहुसंख्यक लोग मराठी भाषा बोलते हैं जबकि यह चारों ओर से कन्नड़ भाषी लोगों से घिरा है। 1956 के राज्य पुनर्गठन के बाद महाजन आयोग में कासरगोड को कर्नाटक को सौंपने का निर्देश दिया जिसे केरल मानने को तैयार नहीं है संसद ने कर्नाटक और महाराष्ट्र के सांसदों ने इसका जोरदार विरोध किया पंजाबी सूबे के निर्माण के बाद राज्यों में सीमा निर्माण के लिए शाह आयोग की स्थापना हुई इस आयोग में चंडीगढ़ को हरियाणा का भाग माना लेकिन अकाली दल ने इसका कड़ा विरोध किया संघ सरकार ने एक मध्यम मार्ग अपनाने के लिए एक सूत्र प्रस्तुत किया जिसके अनुसार……… 1-चंडीगढ़, पंजाब को सौंप दिया जाए 2-फजलीका और अगोहर तहसील हरियाणा को सौंप दिया जाए लेकिन पंजाब या अकाली दल ने इसका कड़ा विरोध किया कावेरी जल विवाद का मुद्दा तमिलनाडु केरल कर्नाटक तथा पांडिचेरी के मध्य का है 1924 के समझौते के अनुसार कावेरी के जल का विभाजन किया गया था लेकिन 1975 में समझौता समाप्त हो गया परिणाम स्वरूप कर्नाटक और तमिलनाडु के मध्य जल बंटवारे को लेकर एक लंबा संघर्ष हुआ वर्तमान समय में यह समस्या लगभग समझने के कागार पर आ गई है नर्मदा नदी के जल विवाद को लेकर गुजरात मध्य प्रदेश राजस्थान महाराष्ट्र के मध्य विवाद उत्पन्न हुआ है इस विवाद को सुलझाने के लिए एक न्यायाधिकरण की स्थापना हुई 1969 और 1978 में न्यायाधिकरण ने अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत किए जिसके पश्चात इस विवाद का समाधान हो गया धन्यवाद ।

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