स्वतंत्रता के लगभग 6 दशक पूरे होने के बाद भारतीय संसदीय लोकतंत्र के समक्ष अनेक समस्यायें उठ खड़ी हुई हैं जिनमें भ्रष्टाचार का मुद्दा सर्वाधिक ज्वलन्त रूप में सामने आया है । जहाँ एक तरफ सम्बन्धित व्यवस्था के परिप्रेक्ष्य में अरब जगत में जन - विद्रोह की लहर उठी उसी के साथ - साथ विश्व भर में व्यवस्था परिवर्तन का स्वर मुखरित होने लगा । इसने भारत में भी स्वीडिश ओम्बुड्समैन के भ्रष्टाचार से मुक्ति पाने के मुख्य अस्त्र के विकल्प पर वर्तमान में | खुली बहस को जोरदार हवा दी है । टीम अन्ना और उनके सहयोगियों ने अपने जनलोकपाल को सरकारी लोकपाल के दावे के रूप में मुखर किया है । वस्तुतः दोनों लोकपाल प्रारूपों और उनकी प्रभावशीलता पर विचार करना महत्वपूर्ण विषय है । यदि समय के पिछले पड़ावों पर दृष्टि डाली जाये तो इंगित होता है कि भारत में लोकपाल के गठन पर प्रयास 6 वें दशक के आखिरी वर्षों में ही प्रारम्भ हो गये थे । इसी उद्देश्य से प्रथम प्रशासनिक आयोग के गठन की अनुशंसा की गई । इसके अनुसरण में लोकपाल विधेयक सर्वप्रथम चौथी लोकसभा के कार्यकाल के दौरान 1968 में प्रस्तुत किया गया , जहाँ यह 1969 में लोकसभा से पारित भी हुआ , किन्तु यह राज्य सभा में लम्बित रहने की स्थिति में चौथी लोकसभा के विघटित होने कारण यह विधेयक समाप्त हो गया । अनन्तर विगत वर्षों में कई बार लोकपाल संस्था के गठन हेतु विधेयक पुनः प्रस्तुत किए गए परंतु यह संस्था अभी भी वास्तविक नहीं बन सकी है । इस क्रम में दिसम्बर 2013 में क्रमशः राज्य सभा और लोकसभा द्वारा पारित होने के पूर्व इसे लगभग 8 बार पारित कराने के प्रयास किये गये किन्तु हर बार यह विधेयक संसद के दोनों सदनों की दहलीज पार करने में ही असफल हो गया । इस असफलता के पीछे की कहानी भारतीय लोकतंत्र पर कहीं न कहीं व्यंग्य ही कसती नजर आती है कि लोकतंत्र के प्रतिनिधि आखिर महंगाई , बेरोजगारी , भ्रष्टाचार और क्षेत्रीयवाद की समस्याओं को खत्म करने के लिए आखिर किस प्रकार की और कैसी कोशिशें कर रहे थे यद्यपि कि संसद द्वारा लोकपाल विधेयक पारित होकर कानून का रूप तो ले चुका है किन्तु यह भ्रष्टाचार के आगोश में डूबी सरकारी मशीनरी को किस हद तक मुक्त कर जनता को संतुष्ट कर पायेगा यह आने वाले समय में ही तय होगा । जहाँ तक इसके प्रावधानों का सवाल है तो इसमें केंद्र और राज्य स्तर पर लोकपाल और लोकायुक्तों की नियुक्ति होगी । लोकपाल की नियुक्ति एक चयन समिति करेगी जिसमें प्रधानमंत्री सहित लोकसभा अध्यक्ष विपक्ष के नेता प्रमुख व मुख्य न्यायाधीश भूमिका में होंगे । साथ ही इनकी संस्तुति पर राष्ट्रपति चार प्रख्यात विधिवेत्ताओं को भी नामित करेगा । पदमुक्ति के बाद लोकपाल और अन्य सदस्यों को पुनर्नियुक्ति का अधिकार नहीं होगा । अब सवाल इनके द्वारा किये जाने वाले कार्यों का है । प्रधानमंत्री सहित सभी सरकारी लोग इसके क्षेत्राधिकार के अधीन होंगे । अन्य सभी श्रेणियों के सरकारी कर्मचारी भी लोकपाल के क्षेत्राधिकार के अंतर्गत लाये गये हैं । यह संस्था सीबीआई के द्वाराभ्रष्ट लोगों पर नजर रखेगी और महत्वपूर्ण जाँच एजेंसियों के प्रमुखों की नियुक्ति सम्बन्धी प्रावधानों को पारदर्शी बनाने की कोशिश भी की गई है । इस प्रकार सीबीआई अब पहले से ज्यादा स्वतंत्र होकर भ्रष्टाचार में संलिप्त दोषियों के खिलाफ कार्रवाही कर सकेगी । सरकारी विधेयक में यह प्रावधान है कि वैदेशिक मामलों , सुरक्षा एवं रक्षा से संबंधित मामलों में प्रधानमंत्री के विरुद्ध जाँच की शक्ति लोकपाल के पास नहीं होगी । सरकारी लोकपाल विधेयक के तहत भ्रष्टाचार के दोषी को न्यूनतम 6 माह एवं अधिकतम 7 वर्ष तक की सजा हो सकती है तथा भ्रष्टाचार के मामलों में सरकार को हुई धन हानि की क्षतिपूर्ति का भी कोई प्रावधान नहीं है । लोकपाल विधेयक के द्वारा विशेष सत्र न्यायालयों के गठन का भी प्रावधान किया गया है । इस अधिनियम के लागू होने के 365 दिनों के भीतर राज्य विधानसभाओं द्वारा लोकायुक्तों की राज्य स्तर पर नियुक्ति की जायेगी । दूसरी ओर सरकारी लोकपाल विधेयक के पारित होने के बाद रालेगढ़सिद्धि अनशन पर बैठे अन्ना हजारे ने अपना अनशन खत्म कर दिया । उल्लेखनीय बात यह है कि सरकारी लोकपाल विधेयक में जनलोकपाल की पूर्व में प्रस्तावित लोकपाल विधेयकों के विपरीत कई बातों को शामिल किया गया है किन्तु मूलतः यह अभी भी उससे | अलग ही है । यह अंतर लोकपाल नियुक्ति में भाग लेने वाले सरकारी और गैर सरकारी सदस्यों की भागीदारी , न्यायपालिका को लोकपाल के अधीन लाने और राज्यों में लोकायुक्तों की नियुक्ति तथा मुख्य | सतर्कता आयुक्त ( सीवीसी ) को लोकपाल के निर्देश पर कार्य करने आदि से संबंधित हैं । इन स्तरों पर दोनों में पर्याप्त अंतर है । जन लोकपाल विधेयक में सीबीआई और सीवीसी तथा विभिन्न विभागों में कार्यरत विजिलेंस शाखाओं को लोकपाल संस्था के तहत रखा गया | है । जन लोकपाल विधेयक में झूठी शिकायत करने वाले पर जुर्माना | लगाने का भी प्रावधान किया गया है । जन लोकपाल विधेयक के | तहत लोकपाल संस्था में 10 सदस्य होंगे जिनमें चार विधिक पृष्ठभूमि के सदस्य तथा शेष छ : समाज के विभिन्न क्षेत्रों के महत्वपूर्ण गणमान्य व्यक्ति होंगे । जनलोकपाल विधेयक में प्रधानमंत्री की भूमिका पर भी | सवाल उठाते हुए उन्हें सीधे तौर पर लोकपाल की जाँच के अधीन लाने की बात की गई थी । अन्ना हजारे ने हालांकि सरकारी लोकपाल | विधेयक के पारित होने को अपनी मूक सहमति दे दी है किन्तु यह | भ्रष्टाचार को किस प्रकार खत्म करेगा , इस पर उन्होंने ज्यादा बोलने से इनकार कर जनलोकपाल को ही प्रभावी बताया है । भ्रष्टाचार जैसे | अति संवेदनशील मुद्दे पर केंद्र सरकार के वर्तमान रुख को देखकर | संभवतः यह माना जा सकता है कि वह भी इसे पारित कर भ्रष्टाचार को खत्म करने से ज्यादा उससे होने वाले चुनावी फायदों - नुकसान को ही ज्यादा अहमियत दे रही है । आज के दौर में सत्ता पर काबिज | लगभग सभी दलों का यही हाल दिखता है । दिल्ली में जनलोकपाल | विधेयक के मुद्दे पर भारतीय जनता पार्टी और काँग्रेस के तथाकथित | विरोध से गिरने वाली केजरीवाल सरकार की कहानी ऐसा ही कुछ बयां करती है ।कुल मिलाकर यह समीचीन प्रतीत होता है कि हाल में जनता की मनोदशा काफी बदली है तथा भ्रष्टाचार से निजात पाने के लिए यह भी कोशिशें कर रही है । अब यह देखने वाली बात होगी किसरकारी लोकपाल , जनलोकपाल और जनता को राजनीतिक दलों से की जा रही अपेक्षा भ्रष्टाचार को खत्म करने में कहाँ तक सफल हो सकेगी ?
यह जरूरी नहीं कि हम दंड के माध्यम से ही किसी समस्या का समाधान करें हां लेकिन यह कुछ हद तक हम ऐसा कर सकते हैं । बच्चे का दिमाग बचपना अवस्था में बहुत कोमल होता है। हमें दंड देते समय वह सारा प्रयास करना चाहिए कि बच्चे डरे नहीं, बल्कि उसे समझे क्योंकि डर बच्चे को कमजोर बना सकती है।घर में माता पिता और स्कूलों में अध्यापकों को इस बात का ध्यान रखना चाहिए।हमें समझना चाहिए कि यदि कोई बालक किसी भी प्रकार की गलती करता है तो वह उसकी उम्र है और इस उम्र में बच्चे ऐसा करते हैं और जब वह ऐसा करें तो हमें उन्हें प्रेम से समझाना चाहिए और उन्हें बताना चाहिए कि यह अमुक वस्तु आपने तोड़ दिया है सोचिए फिर आप कैसे खेलेंगे तो कल खेलना है नहीं तो मैं दूसरी ला दूंगा लेकिन इसे दोबारा मत तोड़ना, कहने का अर्थ बच्चे को ज्यादातर उसकी गलती पर समझाएं और इस तरह समझाए कि उसे यह न लगे कि आप उस पर नाराज है या गुस्से में समझा रहे हैं।इस तरह से वह समझेगा भी और उसके बुद्धि का विकास भी होगा और आने वाले जीवन में भी वह बहुत सी समस्याओं का समाधान स्वयं कर सकेगा और हम एबी जानते हैं कि संसार में सुख कम और दुख ज्यादा है तो...
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