मानव सृष्टि के आरम्भ से ही एक गतिशील प्राणी रहा है । कालांतर में सभ्यता के विकास के साथ - साथ उसमें नई चेतना का अभ्युदय हुआ । वह अपनी महत्वपूर्ण आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए ही लम्बी दूरी की यात्रा करने लगा । दो स्थानों के बीच यातायात के साधनों के विकसित हो जाने के कारण जनसाधारण को छोटी - छोटी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए ज्यादा दूरी की यात्रा आवश्यक नहीं , रह गयी । मनुष्य द्वारा मनोरंजन , अर्थोपार्जन तथा सांस्कृतिक आदान प्रदान के लिए एक स्थान से दूसरे स्थान के भ्रमण को एक शब्दों में ‘ पर्यटन ' की संज्ञा दी जाती है । पूर्व में पर्यटन मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति का साधन था , किन्तु जहां तक वर्तमान का विषय है यह अर्थोपार्जन और मनोरंजन का साधन बन गया है और इसे उद्योग का दर्जा प्रदान कर दिया गया है । भारत ने तो पर्यटन के क्षेत्र में विश्व में अपना महत्वपूर्ण स्थान बना लिया है । द्वितीय विश्वयुद्ध के उपरान्त पर्यटन एक महत्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय उद्योग के रूप में विकसित हुआ है । जब किसी देश से कोई व्यक्ति अन्य देश में आता है , तब उसके कई फायदे हो सकते हैं । प्रथम तो यात्रा आधारित मनोरंजन और ज्ञान का अनुपम स्रोत प्राप्त होता है । इसके अलावा विदेशी मुद्रा अर्जन और लोगों में आपसी सद्भाव बढ़ाने में भी पर्यटन की भूमिका महत्वपूर्ण होती है ।
यह पर्यटन के माध्यम से दो देशों के मध्य सांस्कृतिक आदान - प्रदान होता है और दो राष्ट्रों के बीच गैर राजनीतिक सम्पर्क भी स्थापित होता है । निश्चय ही आर्थिक दृष्टि से पर्यटन अपरिमित लाभ का स्रोत है । अपने अतीत से ही भारत शेष विश्व के लिए आकर्षण का केंद्र रहा है । विदेशियों को भारत की आर्थिक समृद्धि ने आकर्षित किया । यहां की प्रकृति ने विविधता का सृजन किया है और यह विविधता उस समय भी प्रकट होती है , जब आक्रमणकारियों के साथ आए प्रबुद्ध वर्ग ने भारत की यात्रा की । आक्रमणकारी जहाँ भारत की आर्थिक सम्पदा को लूट रहे थे , वहीं आक्रमणकारियों के साथ आए विद्वान् भारतीय अध्यात्म , दर्शन और संस्कृति का ज्ञान प्राप्त कर रहे थे , जो आज इतिहास का विषय बना हुआ इतिहास पर दृष्टि डाले तो यह स्पष्ट होता है कि प्राचीनकाल से आधुनिक काल तक अनेक लोग भ्रमण करने के लिए आए । उनमें से जो शिष्ट थे , वे या तो श्रद्धापूर्वक इसका दर्शन कर और इसकी प्रशंसा कर लौट गए या फिर उन्हें भारत से इतना प्यार हो गया कि वे यहीं रह गये । किन्तु जो अशिष्ट एवं स्वार्थी थे , उन्होंने इसका शोषण किया । भारत प्राकृतिक रूप से एक समृद्धिशाली देश है । प्रकृति ने भारत को हिमालय पर्वत के रूप में मुकुट प्रदान किया , तो हिन्द महासागर के रूप में चरण - पखारक । पृथ्वी और उस पर रहने है ।वाले जीवों की जीवन रक्षा के लिए विशाल नदियाँ प्रदान कीं , तो वहीं दूसरी ओर छोटी - छोटी झीलें और झरने भी प्रदान किए । वृक्षों से भरा पर्वतीय प्रदेश प्रदान किया , तो बालुका स्तूपों से भरा विशाल रेगिस्तान भी । निश्चय ही भारत की प्राकृतिक विरासत अनुपम है । प्राचीनकाल से लेकर आधुनिक काल तक विभिन्न शासकों ने वास्तुकला एवं स्थापत्यकला में अनेक प्रकार के उदाहरण स्थापित कर उसकी सुंदरता में चार चाँद ही लगा दिए । प्राचीनकाल में दक्षिण भारत के पल्लव शासकों ने जहां द्रविड़ शैली में विशाल मंदिरों का निर्माण किया । वहीं अजंता और एलोरा की गुफाओं में चित्रकारी और मूर्तिकला का कार्य भी किया गया । मध्यकाल में एक ओर जहाँ राजपूत तथा मुगल शासकों ने बड़े - बड़े राजप्रासादों का निर्माण किया , वहीं मंदिर , मस्जिद और स्मारकों के रूप में अनेक सुंदर स्थापत्यों का निर्माण भी करवाया । खजुराहो के मंदिर , आगरा का ताजमहल , दिल्ली का लालकिला , कुतुबमीनार , फतेहपुर सीकरी में अकबर द्वारा निर्मित विभिन्न स्मारक , मोती मस्जिद आदि मध्यकाल में ही निर्मित वास्तुकलाएं हैं । आधुनिक काल में भी अनेक सुन्दर भवनों तथा मंदिरों का निर्माण हुआ , जिनमें से दिल्ली का ' लोटस टेम्पल ' विशेष प्रसिद्ध है । किन्तु यह भारत का दुर्भाग्य ही रहा है कि पर्यटकों को आकर्षित करने वाले इतने साधनों के बावजूद यहाँ पर्यटन का पर्याप्त विकास अभी तक नहीं हो पाया है । सरकार ने इसे विकसित करने की दिशा में आरम्भ में कोई ठोस कदम नहीं उठाया । भारत के कई पर्यटक स्थल अभी भी परिवहन की सुचारू व्यवस्था से सम्बद्ध नहीं हो पाये हैं । ध्यातव्य हो कि पर्यटन उद्योग को बढ़ावा देने के लिए केंद्र तथा राज्य सरकारों द्वारा अनेक योजनाएँ बनायी गयी हैं । फिर भी , वित्तीय तथा दूसरी तरह के प्रोत्साहन देने की योजनाओं को और भी तीव्रतातथा सकारात्मकता के साथ लागू करने की आवश्यकता है । भारत सरकार ने पर्यटन प्रोत्साहन नीति की पहली बार घोषणा 1982 में की । इस नीति में यह भी स्पष्ट किया गया कि केंद्र मुख्य रूप से अंतर्राष्ट्रीय पर्यटन का काम देखेगा , जबकि घरेलू पर्यटन के विकास का काम राज्य सरकारें संभालेंगी तथा जहाँ भी आवश्यक होगा केंद्र राज्यों के प्रयासों में तालमेल करने तथा उन्हें आगे बढ़ाने में सहायता करेगा । साथ ही इस बात पर भी बल दिया गया कि | पर्यटन विकास केवल सरकार का दायित्व नहीं है और केंद्र , राज्यों और सार्वजनिक क्षेत्र तथा निजी क्षेत्र के सभी संबंधित संगठनों , विमानन कम्पनियों , रेलवे , संचार , नगरपालिकाओं , स्थानीय निकायों , शिक्षा एवं सांस्कृतिक संस्थाओं आदि को मिलाकर इस दिशा में प्रयत्न करना चाहिए । भारत में पर्यटन विकास सामाजिक व्यवस्था से भी अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है । इससे रोजगार के नए अवसरों का सृजन होता है । जब कोई विदेशी पर्यटक हमारे यहाँ आता है , तो उसे यहाँ के पर्यटक | स्थलों की जानकारी देने वाले गाइड , रहने के लिए होटल , आवागमन के लिए अच्छे साधन आदि की आवश्यकता होती है और इन सबके प्रबन्धन के क्रम में अनेक लोगों को स्वतः ही रोजगार मिल जाता है । पर्यटन के विकास से आय में तो वृद्धि होती है , मनुष्य के रहन - सहन का स्तर भी ऊँचा होता है । निश्चय ही वर्तमान युग में जबकि पर्यटन मनोरंजन और | सांस्कृतिक आदान - प्रदान का साधन मात्र न होकर अर्थोपार्जन का एक | बहुत बड़ा क्षेत्र बन गया है , भारत सरकार तथा भारत के विभिन्न राज्यों की सरकारें , निजी कम्पनियों तथा भारत के जनसाधारण को चाहिए कि भारत में भी पर्यटन के विकास की दिशा में सकारात्मक कदम उठाएं । ~
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