यह जरूरी नहीं कि हम दंड के माध्यम से ही किसी समस्या का समाधान करें हां लेकिन यह कुछ हद तक हम ऐसा कर सकते हैं । बच्चे का दिमाग बचपना अवस्था में बहुत कोमल होता है। हमें दंड देते समय वह सारा प्रयास करना चाहिए कि बच्चे डरे नहीं, बल्कि उसे समझे क्योंकि डर बच्चे को कमजोर बना सकती है।घर में माता पिता और स्कूलों में अध्यापकों को इस बात का ध्यान रखना चाहिए।हमें समझना चाहिए कि यदि कोई बालक किसी भी प्रकार की गलती करता है तो वह उसकी उम्र है और इस उम्र में बच्चे ऐसा करते हैं और जब वह ऐसा करें तो हमें उन्हें प्रेम से समझाना चाहिए और उन्हें बताना चाहिए कि यह अमुक वस्तु आपने तोड़ दिया है सोचिए फिर आप कैसे खेलेंगे तो कल खेलना है नहीं तो मैं दूसरी ला दूंगा लेकिन इसे दोबारा मत तोड़ना, कहने का अर्थ बच्चे को ज्यादातर उसकी गलती पर समझाएं और इस तरह समझाए कि उसे यह न लगे कि आप उस पर नाराज है या गुस्से में समझा रहे हैं।इस तरह से वह समझेगा भी और उसके बुद्धि का विकास भी होगा और आने वाले जीवन में भी वह बहुत सी समस्याओं का समाधान स्वयं कर सकेगा और हम एबी जानते हैं कि संसार में सुख कम और दुख ज्यादा है तो हमारा कर्तव्य नहीं बनता कि हम उन्हें बताते चलें। इसी प्रकार बच्चा किस स्कूल में पढ़ता और कुछ अन्य चीजें उसके समझ में ना आए तो उसे ढंग से और प्रेम से समझाने का प्रयास करें क्योंकि उसकी मानसिक क्षमता का विकास अभी इतना नहीं हुआ है।प्रयास एक करना चाहिए कि ज्यादातर प्रश्नों को व्यवहार में समझाएं और समझाते वक्त इस बात का विशेष ध्यान दें कि आप की आवाज में गुस्सा आया नाराजगी नहीं बल्कि प्रेम दिखे ।
यदि हम उन्हें डांट कर समझाने का प्रयत्न करेंगे तो वह कुछ कहने से पहले डर जाएगा और उसकी मौलिक प्रतिभा में रुकावट पैदा होगी जो आगे उसके जीवन में डर के रूप में होगी और फिर वह किसी समस्या का निर्णय नहीं ले पाएगा और कमजोर होता चला जाएगा तो हमें वह सब उसे करने दें जो व करना चाहता है बस इस बात का ध्यान रखें कि क्या करना उचित है और क्या अनुचित है यह उसे बताते चलें ।किसी भी इंसान में मौलिक प्रतिभा का विकास तभी होता है जब उसे आसपास का वातावरण ऐसा हो कि उसे कुछ करने से पहले बहुत सोचना ना पड़े हां माता-पिता या अध्यापक को यह समझना चाहिए कि सभी बच्चे पढ़ने में ही आगे नहीं होते उनमें से कुछ खिलाड़ी , नेता, अभिनेता आदि हो सकते हैं। क्योंकि गुणों का विकास मानव प्रवृत्तियों में ईश्वर द्वारा पहले ही दे दिया जाता है इसका तात्पर्य नहीं है कि हम प्रयास करना छोड़ दें।हम सिर्फ उसकी प्रवृत्तियों पर ध्यान दें और उसका मार्गदर्शन भी उसके प्रवृत्तियों के अनुसार करें ।
इससे परिवार समाज एवं देश का विकास होगा। माता पिता अथवा अध्यापक का इतना ही कर्तव्य नहीं बनता बल्कि उन्हें इस प्रकार की व्यवस्था का भी निर्माण करना चाहिए जाए इस बालक की प्रवृत्तियों का ढंग से विकास हो सके । इससे उसके मालिक गुणों का विकास होगा जिसके परिणाम स्वरूप व समाज अथवा देश में अपनी अलग पहचान बनाने में सक्षम होगा।निश्चय ही किसी समस्या का समाधान शारीरिक दंड अथवा डांट नहीं है इसका तात्पर्य भी नहीं की उसे स्वतंत्र छोड़ दिया जाए। किंतु शारीरिक दंड अथवा डॉट व्यक्ति को कमजोर बनाता है और आगे बढ़ने अथवा नया करने से रोकता है। आज आप अन्य देशों में इस प्रकार की सुविधाएं देख सकते हैं,जहां बच्चों की प्रतिभा का पूरी तरह ख्याल रखा जाता है जिससे वहां के बच्चों में अपनी प्रतिभा का विकास करने का मौका मिल जाता है परिणाम स्वरूप आप देख सकते हैं कि ओलंपिक से लेकर किसी खेल में उसकी पदकों की संख्या अधिक होती है।आज हमारे देश में बच्चों के लिए बनाए गए संस्थानों में ऐसा कोई संस्थान नहीं है जो अन्य देशों की तरह बच्चों को सुविधाएं प्रदान करें तो क्या माता-पिता या गुरुओं का यह कर्तव्य नहीं बनता कि यह सोचे कि हमारा बच्चा अपनी प्रतिभा के अनुरूप शिक्षा ग्रहण कर पा रहा है या इस तरह के संस्थान है जो उसे व्यवस्था देख सके । यह हमारा कर्तव्य बनता है कि हम सोचे की बस पड़ा देने से उसके जीवन की समस्याओं का समाधान नहीं होगा, जब तक उस प्रकार की व्यवस्था न दी जाए।हमें उसे अपने अनुसार न बनाएं बल्कि उसे उसके अनुसार बनने दें।और हमें एक बात का विशेष ध्यान देना होगा कि ऐसा ना हो कि ज्यादा समझाने में वह अपनी प्रतिभा ही खो दे ।
बालमन को सतत विकास शील बना रहने देना चाहिए। इसके लिए आवश्यक है कि बच्चों पर सकारात्मक प्रभाव देने वाले दंड का ही प्रयोग करना चाहिए,चुकी बच्चों में अपने आसपास की प्रत्येक वस्तु के विषय में जानकारी रखने की सतत जिज्ञासा होती है और इसी जिज्ञासा की पूर्णता हेतु वह हमेशा किसी न किसी कार्य में संलग्न रहते हैं । बच्चों का मनोविज्ञान पूर्णतः विकासात्मक होता है और वे प्रत्येक कार्य को सिर्फ निश्चल मनोभाव से जानने की इच्छा से ही करते हैं वह चाहे घर हो या विद्यालय, इसलिए माता-पिता तथा अध्यापक जनों का यह कर्तव्य है कि बच्चों को विकास के अनुरूप सकारात्मक ठंडी दे। बालमन निष्कपट होता है और वह सिर्फ अधिक से अधिक जानने की प्रयास में गलत कार्य कर बैठता है लेकिन शायद बालमन इस बात से अनभिज्ञ रहता है कि हमने गलत कार्य किया है ।
बाल्यावस्था में किए गए कार्यों में कौन गलत है कौन सही है इसका निर्धारण माता पिता तथा गुरु करते हैं, क्योंकि बच्चे कार्य को सकारात्मक मनोविज्ञान से करते हैं, सो उनको घर पर माता पिता द्वारा तथा विद्यालय में गुरुद्वारा शारीरिक दंड दिया जाना सर्वथा अनुचित है, क्योंकि सारे दंड नकारात्मक दंड की श्रेणी में आता है।इसलिए इस पर पूर्ण प्रतिबंध होना चाहिए तथा ध्यान रहे बच्चे हमारे देश का भविष्य है,तो उनको इस मानसिक विकास की अवस्था में सकारात्मक दंड पर विकासात्मक का दंड ही देना चाहिए, उनको घर में, विद्यालय में सही या गलत कार्य में फर्क समझना चाहिए। बच्चों को जितनी बातें हम समझा कर बता सकते हैं, उतना शारीरिक दंड देकर नहीं समझा सकते,क्योंकि शारीरिक दंड एक नकारात्मक दंड की श्रेणी में आता है व जब हम इसका प्रयोग बच्चों पर करेंगे तो निश्चय ही उन पर इसका बुरा असर पड़ेगा तथा शारीरिक दंड पाकर बच्चा कुंठित हो जाता है क्योंकि उसे तो गलत सही में भेद मालूम नहीं होता तथा बच्चे का सकारात्मक विकासात्मक मनोहर शारीरिक दंड के तले दब जाता है उनका मानसिक विकास बाधित हो जाता है तथा वह और भी गलत कार्यों की तरफ उन्मुख हो जाता है।
निष्कर्ष रूप में हम कह सकते हैं कि यदि हमें अपने घर में एक अच्छा इंसान पैदा करना है तो बच्चों को शारीरिक दंड देने से बचाना होगा तथा विद्यालय से एक अच्छा विद्यार्थी निकालना है तो अध्यापकों को भी शारीरिक डर से बचाना होगा।
बच्चों को शारीरिक दंड देने पर कानूनी प्रतिबंध से ज्यादा प्रभाव कारी यही होगा कि अभिभावक तथा गुरुजन दोनों बच्चों को शारीरिक दंड देने से सर्वथा बचे, तो ही हम भारत को विश्व को एक अच्छा सभ्य सम्मानित नागरिक दे सकते हैं।
यदि हम उन्हें डांट कर समझाने का प्रयत्न करेंगे तो वह कुछ कहने से पहले डर जाएगा और उसकी मौलिक प्रतिभा में रुकावट पैदा होगी जो आगे उसके जीवन में डर के रूप में होगी और फिर वह किसी समस्या का निर्णय नहीं ले पाएगा और कमजोर होता चला जाएगा तो हमें वह सब उसे करने दें जो व करना चाहता है बस इस बात का ध्यान रखें कि क्या करना उचित है और क्या अनुचित है यह उसे बताते चलें ।किसी भी इंसान में मौलिक प्रतिभा का विकास तभी होता है जब उसे आसपास का वातावरण ऐसा हो कि उसे कुछ करने से पहले बहुत सोचना ना पड़े हां माता-पिता या अध्यापक को यह समझना चाहिए कि सभी बच्चे पढ़ने में ही आगे नहीं होते उनमें से कुछ खिलाड़ी , नेता, अभिनेता आदि हो सकते हैं। क्योंकि गुणों का विकास मानव प्रवृत्तियों में ईश्वर द्वारा पहले ही दे दिया जाता है इसका तात्पर्य नहीं है कि हम प्रयास करना छोड़ दें।हम सिर्फ उसकी प्रवृत्तियों पर ध्यान दें और उसका मार्गदर्शन भी उसके प्रवृत्तियों के अनुसार करें ।
इससे परिवार समाज एवं देश का विकास होगा। माता पिता अथवा अध्यापक का इतना ही कर्तव्य नहीं बनता बल्कि उन्हें इस प्रकार की व्यवस्था का भी निर्माण करना चाहिए जाए इस बालक की प्रवृत्तियों का ढंग से विकास हो सके । इससे उसके मालिक गुणों का विकास होगा जिसके परिणाम स्वरूप व समाज अथवा देश में अपनी अलग पहचान बनाने में सक्षम होगा।निश्चय ही किसी समस्या का समाधान शारीरिक दंड अथवा डांट नहीं है इसका तात्पर्य भी नहीं की उसे स्वतंत्र छोड़ दिया जाए। किंतु शारीरिक दंड अथवा डॉट व्यक्ति को कमजोर बनाता है और आगे बढ़ने अथवा नया करने से रोकता है। आज आप अन्य देशों में इस प्रकार की सुविधाएं देख सकते हैं,जहां बच्चों की प्रतिभा का पूरी तरह ख्याल रखा जाता है जिससे वहां के बच्चों में अपनी प्रतिभा का विकास करने का मौका मिल जाता है परिणाम स्वरूप आप देख सकते हैं कि ओलंपिक से लेकर किसी खेल में उसकी पदकों की संख्या अधिक होती है।आज हमारे देश में बच्चों के लिए बनाए गए संस्थानों में ऐसा कोई संस्थान नहीं है जो अन्य देशों की तरह बच्चों को सुविधाएं प्रदान करें तो क्या माता-पिता या गुरुओं का यह कर्तव्य नहीं बनता कि यह सोचे कि हमारा बच्चा अपनी प्रतिभा के अनुरूप शिक्षा ग्रहण कर पा रहा है या इस तरह के संस्थान है जो उसे व्यवस्था देख सके । यह हमारा कर्तव्य बनता है कि हम सोचे की बस पड़ा देने से उसके जीवन की समस्याओं का समाधान नहीं होगा, जब तक उस प्रकार की व्यवस्था न दी जाए।हमें उसे अपने अनुसार न बनाएं बल्कि उसे उसके अनुसार बनने दें।और हमें एक बात का विशेष ध्यान देना होगा कि ऐसा ना हो कि ज्यादा समझाने में वह अपनी प्रतिभा ही खो दे ।
बालमन को सतत विकास शील बना रहने देना चाहिए। इसके लिए आवश्यक है कि बच्चों पर सकारात्मक प्रभाव देने वाले दंड का ही प्रयोग करना चाहिए,चुकी बच्चों में अपने आसपास की प्रत्येक वस्तु के विषय में जानकारी रखने की सतत जिज्ञासा होती है और इसी जिज्ञासा की पूर्णता हेतु वह हमेशा किसी न किसी कार्य में संलग्न रहते हैं । बच्चों का मनोविज्ञान पूर्णतः विकासात्मक होता है और वे प्रत्येक कार्य को सिर्फ निश्चल मनोभाव से जानने की इच्छा से ही करते हैं वह चाहे घर हो या विद्यालय, इसलिए माता-पिता तथा अध्यापक जनों का यह कर्तव्य है कि बच्चों को विकास के अनुरूप सकारात्मक ठंडी दे। बालमन निष्कपट होता है और वह सिर्फ अधिक से अधिक जानने की प्रयास में गलत कार्य कर बैठता है लेकिन शायद बालमन इस बात से अनभिज्ञ रहता है कि हमने गलत कार्य किया है ।
बाल्यावस्था में किए गए कार्यों में कौन गलत है कौन सही है इसका निर्धारण माता पिता तथा गुरु करते हैं, क्योंकि बच्चे कार्य को सकारात्मक मनोविज्ञान से करते हैं, सो उनको घर पर माता पिता द्वारा तथा विद्यालय में गुरुद्वारा शारीरिक दंड दिया जाना सर्वथा अनुचित है, क्योंकि सारे दंड नकारात्मक दंड की श्रेणी में आता है।इसलिए इस पर पूर्ण प्रतिबंध होना चाहिए तथा ध्यान रहे बच्चे हमारे देश का भविष्य है,तो उनको इस मानसिक विकास की अवस्था में सकारात्मक दंड पर विकासात्मक का दंड ही देना चाहिए, उनको घर में, विद्यालय में सही या गलत कार्य में फर्क समझना चाहिए। बच्चों को जितनी बातें हम समझा कर बता सकते हैं, उतना शारीरिक दंड देकर नहीं समझा सकते,क्योंकि शारीरिक दंड एक नकारात्मक दंड की श्रेणी में आता है व जब हम इसका प्रयोग बच्चों पर करेंगे तो निश्चय ही उन पर इसका बुरा असर पड़ेगा तथा शारीरिक दंड पाकर बच्चा कुंठित हो जाता है क्योंकि उसे तो गलत सही में भेद मालूम नहीं होता तथा बच्चे का सकारात्मक विकासात्मक मनोहर शारीरिक दंड के तले दब जाता है उनका मानसिक विकास बाधित हो जाता है तथा वह और भी गलत कार्यों की तरफ उन्मुख हो जाता है।
निष्कर्ष रूप में हम कह सकते हैं कि यदि हमें अपने घर में एक अच्छा इंसान पैदा करना है तो बच्चों को शारीरिक दंड देने से बचाना होगा तथा विद्यालय से एक अच्छा विद्यार्थी निकालना है तो अध्यापकों को भी शारीरिक डर से बचाना होगा।
बच्चों को शारीरिक दंड देने पर कानूनी प्रतिबंध से ज्यादा प्रभाव कारी यही होगा कि अभिभावक तथा गुरुजन दोनों बच्चों को शारीरिक दंड देने से सर्वथा बचे, तो ही हम भारत को विश्व को एक अच्छा सभ्य सम्मानित नागरिक दे सकते हैं।
Comments
Post a Comment