यह जरूरी नहीं कि हम दंड के माध्यम से ही किसी समस्या का समाधान करें हां लेकिन यह कुछ हद तक हम ऐसा कर सकते हैं । बच्चे का दिमाग बचपना अवस्था में बहुत कोमल होता है। हमें दंड देते समय वह सारा प्रयास करना चाहिए कि बच्चे डरे नहीं, बल्कि उसे समझे क्योंकि डर बच्चे को कमजोर बना सकती है।घर में माता पिता और स्कूलों में अध्यापकों को इस बात का ध्यान रखना चाहिए।हमें समझना चाहिए कि यदि कोई बालक किसी भी प्रकार की गलती करता है तो वह उसकी उम्र है और इस उम्र में बच्चे ऐसा करते हैं और जब वह ऐसा करें तो हमें उन्हें प्रेम से समझाना चाहिए और उन्हें बताना चाहिए कि यह अमुक वस्तु आपने तोड़ दिया है सोचिए फिर आप कैसे खेलेंगे तो कल खेलना है नहीं तो मैं दूसरी ला दूंगा लेकिन इसे दोबारा मत तोड़ना, कहने का अर्थ बच्चे को ज्यादातर उसकी गलती पर समझाएं और इस तरह समझाए कि उसे यह न लगे कि आप उस पर नाराज है या गुस्से में समझा रहे हैं।इस तरह से वह समझेगा भी और उसके बुद्धि का विकास भी होगा और आने वाले जीवन में भी वह बहुत सी समस्याओं का समाधान स्वयं कर सकेगा और हम एबी जानते हैं कि संसार में सुख कम और दुख ज्यादा है तो...
CONNECT WITH YOUR COMMUNITY & READ ABOUT AFFAIRS NOT PARTIES , WE’VE GOT THE GREATEST WRITERS
Comments
Post a Comment