एसी अभिकल्पना की जा रही है कि जैसे-जैसे विश्व व्यापार संगठन के देशों के बीच कृषि बाजार खुलते और स्वतंत्र होते जा रहे हैं वैसे वैसे कृषि क्षेत्र में किसानों की आर्थिक संभावनाएं बढ़ती जा रही है अंतरराष्ट्रीय स्तर पर या भी माना जा रहा है कि कृषि प्रधान देशों में कृषि उत्पादों के विपणन की बाधाएं दूर कर किसानों की आर्थिक स्थिति मजबूत की जा रही है और उपभोक्ताओं के लिए बेहतर विकल्प दल कराए जा सकते है। इस संदर्भ में भारत के लिए यह बात अति महत्वपूर्ण है कि नए प्रमुख खाद्य आयातक देश से अब वह एक कृषि निर्यातक देश बनता जा रहा है भारत कृषि प्रधान एवं गांव का देश है यहां देश की तीन चौथाई जनसंख्या निवास करती है जो कृषि पर निर्भर है कविवर सुमित्रानंदन पंत हो के शब्दों में
तिनकों को हरे- हरे तन पर , हिल, हरित रुधिर है रहा झलक।
श्यामल भूतल पर झुका हुआ, नभ का चीर निर्मल नील फलक।
वास्तव में ग्रामीण छटा का सौंदर्य अद्भुत होता है ऐसा लगता है कि यहां कि पृथ्वी रूपी नायिका हरी-भरी पुष्पा अंकित साड़ी पहनने का स्त्रियों के रूप में रोमांचित ऑस्कर स्वेद बिंदु युक्त हो अपने गगन रूपी प्रियतम से मिलने के लिए छटपटा रही हो।और वहां निष्ठुर दूर से ही रात्रि के समय तारागढ़ रूपी दांत दिखा कर उसकी हंसी उड़ा रहा हो।
कहने का तात्पर्य है कि ग्रामीण परिवेश का वातावरण अति रमणीय होता है जहां कृषि कार्य के लिए किसानों को प्राकृतिक सौंदर्य के साथ-साथ सरकारी प्रोत्साहन और मदद की आवश्यकता है।
वर्ष 2019और 20 के केंद्रीय बजट में भी केंद्र सरकार ने किसानों की आर्थिक स्थिति को मजबूत करने पर जोर दिया है। अब तक आम बजट को शहर और औद्योगिक घरानों के लिए ही देखा जाता था परंतु देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने और उसे लंबे समय तक बनाए रखने के प्रयास में सरकार ने कृषि क्षेत्र में अच्छे दिन लाने की प्रतिबद्धता दिखाई है वर्तमान सरकार ने किसानों की आमदनी बढ़ाने पर जोर देते हुए वर्ष 2022 तक इसे दोगुना करने की बात कही है हालांकि लगातार दो वर्ष से सूखा एवं प्रकृति आपदा की मार झेल रहे किसानों को सरकार से सीधे कोई फायदा मिलने की उम्मीद टूटी है लेकिन सरकार ने कृषि क्षेत्र की बुनियादी सुविधा के रूप में सिंचाई भूमि उर्वरता जैसी जरूरतों पर जोर दिया है और कृषि उत्पादक को बड़ा बाजार मुहैया कराने की बेहतर व्यवस्था की बात कही है।
वित्त मंत्री ने अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए न्यू के रूप में जो प्राथमिकताएं गिनाई है उसे कृषि का स्थान पहले नंबर पर है लंबे समय बाद यह मौका आया जब आम बजट में कृषि और ग्रामीण भारत को प्राथमिकता मिली है कृषि और कृषि कल्याण के लिए ₹35984 की राशि आवंटित की गई है किसानों की आमदनी बढ़ाने के लिए उनसे आम फसल के अलावा अन्य वाणिज्यिक उत्पादों की खेती करने की अपील की गई है खेती के अलावा पशुपालन दुग्ध उत्पादन और मधुमक्खी पालन पर जोर दिया गया है कृषि क्षेत्र को सुदृढ़ बनाने के लिए बजट में सबसे अधिक जोर उत्पादन बढ़ाने पर है इसके लिए उचित माहौल देने के साथ-साथ बुनियादी व्यवस्था सुदृढ़ करने पर बल दिया गया है कृषि क्षेत्र की समस्याओं को करीब से समझते हुए वित्त मंत्री ने उसके निदान के रूप में सिंचाई व्यवस्था सुदृढ़ करने पर जोर दिया है देश की 46 प्रतिशत कृषि को ही सिंचाई सुविधा प्राप्त है प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के जरिए मिशन मोड में 28 .5 हेक्टेयर भूमि को सिंचित क्षेत्र में शामिल किया जाएगा ए बीपी के तहत जिन 89 परियोजनाओं का काम लंबे समय से अटका है उस में तेजी लाने के लिए बजट में 17000 करोड़ का प्रावधान किया गया है।
31 मार्च 2017 तक इनमें से 23 बजने पूरी कर ली जा चुकी है।इस मदद में सरकार ने अगले 5 वर्षों में 86500 करोड रुपए खर्च करने की बात कही है वर्षा सिंचित क्षेत्रों में मनरेगा के जरिए 500000 गड्ढों का निर्माण किया जाएगा पारंपरिक कृषि विकास योजना के जरिए अगले 5 वर्षों में 500000 एकड़ भूमि पर जैविक खेती की जाएगी पूर्वोत्तर एवं पहाड़ी राज्यों में जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने बजट में 412 को रुपए का प्रदन किया है।
इसके अतिरिक्त पशुधन संजीवनी उन्नत बिल्डिंग प्रौद्योगिकी ई पशुधन और देसी प्रजनन के लिए राष्ट्रीय दिनों में केंद्र सरीखे 4 नई परियोजना शुरू की जाएंगी पशुधन संजीवनी के जरिए पशुओं के स्वास्थ्य पर जोर दिया जाएगा इसके लिए नकुल स्वास्थ्य पात्र का प्रावधान है उन्नत ब्रीडिंग प्रौद्योगिकी के जरिए पशुओं की नस्ल सुधारने पर जोर दिया गया है ब्रीडर और किसानों को आपस में जोड़ने के लिए पशुधन हाट का सृजन किया जाएगा साथ ही पशुओं के देसी नस्ल को सुरक्षित करने और उनमें सुधार का जिम्मा राष्ट्रीय जैविक केंद्र पर रहेगा इसके लिए बजट में ₹850 का प्रावधान है किसानों की आमदनी बढ़ाने के लिए खेती के अलावा दूध उत्पादन पशु पालन और मधुमक्खी पालन पर जोर दिया गया है वैश्वीकरण के इस दौर में सरकार द्वारा समर्थन मूल्य की घोषणा राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मूल्य के अनुसार घोषित करने की आवश्यकता है उत्पादकता वृद्धि में घटिया बीज खाद कीटनाशक मुख्य बाधक है इसके लिए दोषी व्यापारियों व निर्माताओं की संपत्ति जप्त कर के कठोर दंड दिया जाना चाहिए छोटे व सीमांत किसानों को नई कृषि पदों की और फसलों के विविधीकरण संबंधी जानकारी देना उचित बीज उर्वरक और कीटनाशक उपलब्ध कराना सबसे बड़ी चुनौती है देश की अधिकांश किसानों के पास 2 हेक्टेयर से कम भूमि है यह समझा जाना चाहिए कि केवल बड़े-बड़े कृषि फार्म ही उत्पादकता बढ़ाने में सहायक नहीं होते छोटे कृषि फार्म से भी उत्पादकता बढ़ाई जा सकती है कृषि सेवा क्षेत्र विस्तार के अंतर्गत कृषि विज्ञान केंद्रों को और चुस्त-दुरुस्त बनाने तथा निजी क्षेत्र की मदद के अलावा कृषि स्नातकों को भी कृषि क्लीनिक चलाने के लिए प्रोत्साहित तथा प्रशिक्षित किया जाना जरूरी है किसानों में यह बात भी प्रभु स्थित करनी होगी कि वह विश्व बाजार में प्रतिस्पर्धा के लिए स्वयं तैयार हो उच्च कोटि की कृषि उत्पादों की उपलब्धता हेतु वृहद पैमाने पर अनुसंधान कराया जाना चाहिए मिट्टी की उर्वरा शक्ति बढ़ाने हेतु रो-रो का पर्यावरण मात्रा व संतुलित उपयोग करना होगा वशीकरण और उदारीकरण के इस दौर में भारतीय किसानों की खुशहाली और निर्यात मोर्चे पर आगे बढ़ने के लिए कृषि गुणवत्ता को सर्वोच्च प्राथमिकता देने की आवश्यकता है।
अंत में यह कहना अनुचित होगा नाक होगा कि अभी भी किसानों को ऋण के लिए साहूकारों पर निर्भर रहना पड़ता है ग्रामीण क्षेत्रों के कमजोर ढांचे से बड़े पैमाने पर कृषि और सहायक उत्पाद नष्ट हो जाते हैं इस प्रकार में यदा-कदा फलों और सब्जियों का 25% तक हिस्सा खराब हो जाता है ऐसे में खेत से लेकर फैक्ट्रियां बाजार तक पहुंचने वाले कृषि उत्पादक की संपूर्ण प्रणाली को दुरुस्त करना होगा तभी कृषि क्षेत्र बेहतर होगा और किसानों की आर्थिक स्थिति समृद्ध होगी।
कृषि और किसानों की दशा में बदलाव की नई नीति।
भारतीय कृषक आज से 100 साल पहले जिस व्यवस्था में था आज भी वह वहीं खड़ा है अनेक वैज्ञानिक सुधार हुए अनेक नवीन तकनीकी ने जन्म लिया अनेक आधुनिक उपकरण बने तथा अनेक वैज्ञानिक शोध हुए परंतु आम भारतीय किसान तक उस तकनीकी का पहुंचना दूर की कौड़ी ही है रोजी रोटी के अवसर लोग होते जा रहे हैं कृषि पर भार बढ़ रहा है विदेशी अश्लीलता बढ़ती रही है और कृषक भूखा होता जा रहा है उसकी समस्याएं उलझती जा रही है वह पानी के लिए आकाश को देखता है तो बीच के लिए वैज्ञानिकों को देखता है तथा कृषि विकास एवं कृषि प्रगति के लिए सरकार का मुंह ताकता है परंतु निराशा ही उसके साथ हाथ लगती ई है भारतीय कृषि की दयनीय स्थिति के लिए संरचनात्मक और वे व्यावहारिक कारण प्रमुख है।संरचनात्मक कारणों में आधुनिक तकनीकी का अभाव तथा अन्य व्यवहार आत्मक कारणों में सामाजिक आर्थिक भौगोलिक आदि कारण शामिल है
देश के किसान आज तमाम तरह की समस्याओं का सामना कर रहे हैं इसकी सबसे बड़ी वजह भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ कृषि के लिए समुचित नीति का अभाव है पूरी अर्थव्यवस्था में कृषि का योगदान भले ही लगभग 14 फ़ीसदी ही हो लेकिन या लगभग 60 फ़ीसदी लोगों की जीविका का आधार है इसके अलावा कमजोर कृषि का प्रभाव सेवा और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर पर भी गंभीरता से महसूस किया जाता है जिस पर सरकार सबसे अधिक ध्यान देती रही है इसके बावजूद किसानों और कृषि के लिए ठोस नीति का लगातार अभाव रहा है इसके परिणाम देश भर में महसूस किए जाते हैं अधिकांश कृषि प्रधान राज्य से किसानों की आत्महत्या के मामले में लगातार इजाफा हो रहा है किसानों के सक्षम कई तरह की समस्याएं मुंह बाए खड़ी है सिंचाई के अभाव से लेकर समय पर क्वालिटी इनपुट प्रोडक्शन टेक्नोलॉजी समय पर ऋण की व्यवस्था गांव से श्रमिकों का पलायन रोककर किसानों को सस्ता श्रम उपलब्ध कराने उपयुक्त फसल बीमा फसल काटने बाद उसके प्रबंधन रखरखाव और फिर कृषि उत्पादों की उचित कीमतों से जुड़ी समस्याओं ने किसानों की कमर तोड़ कर रख दी है पराया देखा जाता है कि सरकार इनमें से कई मामलों पर नीतिगत फैसले तो ले लेती है लेकिन या तो उन फैसलों को सही तरीके से व्यवहारिक रूप नहीं दिया जाता है या फिर भी फैसले ही व्यवहारिक नहीं होते हैं इसलिए किसानों की समस्याएं जस की तस बनी रह जाती है।
किसानों की समस्याएं यहीं तक सीमित नहीं है देश में कृषि से जुड़े लगभग 14 करोड परिवारों में से लगभग 80 फ़ीसदी परिवारों के पास 2 एकड़ से कम जमीन है साफ है कि छोटी लैंडहोल्डिंग के कारण न तो आधुनिक कृषि तकनीकों व तौर तरीकों का उपयोग कर पाते हैं और ना ही सरकारी नीतियों व कार्यक्रमों का फायदा ले पाते हैं और ना ही सरकारी नीतियों व कार्यक्रमों का फायदा ले पाते हैं खेतों के पारंपरिक तरीकों तक सीमित रहने से उनकी उत्पादकता भी यथावत रह जाती है बदले में महंगाई और जरूरतें बढ़ने के कारण वे कर्ज के बोझ से भी लगते चले जाते हैं ऐसे में फसल बीमा पालिसी लोकनीति और तकनीकी उपलब्धता आदि के साथ ही सरकार के लिए यह भी जरूरी है कि किसानों को समूह में खेती करने के लिए प्रेरित करें और इसके लिए उचित दिशा निर्देश तथा नीति बनाएं इससे वे छोटे किसान जिनकी संख्या सबसे अधिक है संकट के समय असहाय महसूस नहीं करेंगे और समस्याओं का मिलकर सामना कर पाएंगे समूह में खेती करने से वह मजबूती से अपनी समस्याओं को सरकारी एजेंसियों के समक्ष रखकर सरकारी नीतियों एवं कार्यक्रमों का पूरा फायदा भी ले पाएंगे इससे बैंकों बीमा कंपनियों के साथ सरकारी एजेंसियों के साथ भी मोलभाव की उनकी क्षमता बढ़ेगी।
सिंचाई की समस्या अभी भी विकराल बनी हुई है देश के अधिकांश हिस्सों में अभी भी उचित सिंचाई सुविधाओं का अभाव है मानसून की कमी अक्सर अभिशाप साबित होती है देश में नदियों और पानी के अन्य स्रोतों की कमी नहीं है लेकिन देश के अधिकांश हिस्सों में पानी की उचित प्रबंध का अभाव है कमजोर वाले 80 फ़ीसदी से अधिक किसान बाजार में उपलब्ध परंपरागत बीच पर निर्भर रहते हैं जो किसान अधिक उपज वाले हाइब्रिड और जीएम बीज बाजार से खरीदते हैं उन्हें भी ठगी का शिकार होना पड़ता है ऐसे में सरकारी एजेंसियों को बड़े स्तर पर बीज उपलब्ध कराने के लिए सामने आना चाहिए इन्हीं सब कारणों से भारतीय किसानों की कृषि उत्पादकता अन्य देशों की तुलना में काफी कम है इसके लिए या इसके अलावा अधिकांश किसान अभी भी चावल और गेहूं जैसी परंपरागत फसलों पर ही निर्भर रहते हैं इसके उनके पास नगदी की हमेशा कमी बनी रहती है कम पढ़े लिखे होने के कारण बेशक अधिकांश किसान इस चीज को नहीं समझ पाते हैं लेकिन सरकारी एजेंसियों को तो इस मामले में किसान को उचित सलाह मशवरा देना चाहिए ताकि उनकी आर्थिक स्थिति बेहतर हो सके।
वर्तमान राजग सरकार द्वारा शुरू किए गए स्किल इंडिया डिजिटल इंडिया और मेड इन इंडिया जैसे कार्यक्रम स्वागत योग्य है क्योंकि इनका बड़ा मकसद छोटे और कमजोर किसान परिवार से आने वाले लोगों को कुशल बनाकर उनकी जीवनशैली बेहतर करना है हालांकि अभी यह कहना कठिन है कि कमजोर किसान इन योजनाओं का कितना फायदा उठा पाते हैं ऐसे में सरकार को इनके लिए ग्रामीण स्तर पर जागरूकता कार्यक्रम भी चलाना होगा क्योंकि अगर देश की 60 फ़ीसदी आबादी की जीवन शैली बेहतर नहीं होगी तो आर्थिक विकास के अपेक्षित नतीजे नहीं आ पाएंगे।
किसानों को कई अन्य मोर्चे पर भी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है फसल कम हो तो समस्या और फसल अधिक हो तब समस्या फसल अधिक होने पर पराया उचित कीमत नहीं मिलने के अलावा भंडारण की समस्या का भी उन्हें सामना करना पड़ता है यह देश का दुर्भाग्य है कई दफा तो कोर्ट को कहना पड़ता है कि अगर भंडारण की व्यवस्था नहीं है तो सरकार को गरीबों में एक फैसले बार देनी चाहिए यह समस्या ऐसे देश में है जहां अभी भी कम से कम 25 फ़ीसदी लोग भुखमरी के शिकार हैं इससे किसानों में काफी खराब संदेश जाता है और सरकार भी अन मने ढंग से इनकी उपज खरीदती है ।
किसानों को भंडारण के अलावा सप्लाई चैनल और मार्केटिंग की भी बड़ी व्यवस्था का सामना करना पड़ता है जो किसान पहले से कर समेत कई तरह की समस्याओं से लाद हो अगर उनके उत्पादों को सही बाजार नहीं मिले तो उनके लिए जीवन का मकसद खत्म हो जाता है इन समस्याओं के लिए राशि ही नहीं राज्य और उससे भी आगे बढ़कर क्षेत्रीय स्तर पर भी उचित व्यवस्था करने की जरूरत है चावल गेहूं जैसी फसलों से अधिक यह समस्या सब्जियों और फलों के मामले में है लगभग 40 फ़ीसदी फसलें और सब्जियां रखरखाव व कोल्ड स्टोरेज के अभाव में बर्बाद हो जाती हैं या बड़ी क्षति है भारत में लगभग 27 करोड से अधिक अनाज की उपज होती है जो यहां के लोगों का पेट भरने के लिए जरूरत से अधिक है इसके बावजूद अगर करोड़ों लोगों को भोग स्वीट्स होना पड़ता है तो इस समस्या की गंभीरता और कारण को समझने में अब और वक्त बर्बाद नहीं करना चाहिए।
उत्तम खेती कही जाने वाली कहावत आज असत्य हो रही है भारत सोने की चिड़िया है या बात भी इतिहास के गर्भ में चली गई अब शेष है तो विडंबना मात्र भारतीय कृषि और कृषक की सभी समस्याओं आज भी उलझी हुई है सामाजिक आर्थिक तथा राजनीतिक सभी समस्याएं उसके लिए उसी प्रकार से उल्टी हुई है जैसे पहले विकास के लिए हुआ है कार्य के लिए नहीं उन्नति प्रचार के लिए हुई है कार्य के लिए नहीं।
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