किसी भी देश के प्रगति तथा विकास के निर्धारण में एक महत्वपूर्ण घटक क्या होता है कि उस देश के विभिन्न क्षेत्रों में संलग्न जनसंख्या में लिंगानुपात की अवस्था क्या है ? इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि भारत अभी लिंग समानता के अपने उद्देश्य को पूरा कर सकने में भी लो पीछे है । महिलाओं के लिए आरक्षण की व्यवस्था मुख्य रूप से इसी उद्देश्य से संचालित है , जिससे महिलाओं को समाज राजनीति और जीवन के सभी क्षेत्रों में उचित प्रतिनिधित्व मिल सके। अब प्रश्न यह उठता है कि भारत में समृद्ध अतीत की स्वामिनी रही नारी को किन परिस्थितियों ने आरक्षण या ऐसे ही अन्य सहायक कार्यक्रमों कानूनों आदि का संबल लेने पर मजबूर कर दिया । इसके लिए नारी की विभिन्न अवस्थाओं पर एक सरसरी नजर दौड़ाने की आवश्यकता है ।
ऐतिहासिक परिपेक्ष - सभ्यता के आदिम युग में नारी को पुरुषों के बनिस्बत अच्छा स्थान प्राप्त था । तत्कालीन परिवार मातृसत्तात्मक हुआ करते थे नारी ही परिवार की नियामक तथा धूरी थी । आर्यों की सभ्यता एवं संस्कृति के प्रसार में भी इनका विशेष योगदान था उस समय यह ब्रह्म ज्ञान भी प्राप्त कर सकती थी इससे उनकी उन्नत स्थिति काश होता ही पता चल जाता है
वैदिक काल में भी पति पत्नी के संबंध क्षमता पर आधारित है स्त्रियां वैदिक क्रियाकलापों के साथ ही यज्ञ कार्य संपादन करती थी गार्गी , मैत्रेई , उद्घालीका , आज विदुषियों ने भी इसी युग में जन्म लिया साथ ही सेना शासन राज्य व्यवस्था मे भी यह अपनी उचित भूमिका का निर्वाहन करती थी समय बदला स्त्रिया की आस्था भी बनाने लगी ।
वैदिक काल में भी पति पत्नी के संबंध क्षमता पर आधारित है स्त्रियां वैदिक क्रियाकलापों के साथ ही यज्ञ कार्य संपादन करती थी गार्गी , मैत्रेई , उद्घालीका , आज विदुषियों ने भी इसी युग में जन्म लिया साथ ही सेना शासन राज्य व्यवस्था मे भी यह अपनी उचित भूमिका का निर्वाहन करती थी समय बदला स्त्रिया की आस्था भी बनाने लगी ।
उत्तर वैदिक काल में स्त्रियों के अधिकार पुर्ववक नहीं रहे । कठोर वर्ण व्यवस्था तथा अनेक कुरीतियों जैसे बहुपत्नी प्रथा अनुलोम विवाह आग के कारण स्त्रियों को घर की चारदीवारी तक ही सीमित करने तथा उन्हें उपभोग की वस्तु मात्र समझे जाने की प्रवृत्ति पनपी । त्याग नम्रता धैर्य और पतिव्रत धर्म का पालन उनका धर्म बन गया और उन्हें शिक्षा से भी वंचित किया जाने लगा ।
बबलू के भारत आगमन से नारी की इस पतन का अवस्था में और अधिक तेजी आई नारी स्वतंत्रता नाम मात्र की रह गई स्त्री शिक्षा लगभग समाप्त कर दी गई सती प्रथा अपने चरमोत्कर्ष पर पहुंच गई बाल विवाह पर्दा प्रथा आदि अनेक रूढ़ियों ने नारी को शक्ति के अतीत की अवधारणा को पूर्ण रूपेण प्रतिस्थापित कर उन्हें अबला अर्थात दूसरों के सहारे जीवन यापन की स्थिति में ला खड़ा किया अब तक नारी अपने न्यूनतम अवस्था को प्राप्त कर चुकी थी जहां उसे दलित शोषित वंचित अबला आदि अनेक अनेक नामों से संबोधित किया जा सकता था अंग्रेजी हुकूमत के दौरान भारतीय समाज में हो रहे आमूलचूल परिवर्तन से नारी समाज भी अछूता ना रहा और तत्कालीन महानायक को जिनमें राजा राममोहन राय ईश्वर चंद्र विद्यासागर महागोव इन द डे ज्योतिबा फूले दयानंद सरस्वती आदि प्रमुख थे नारी कल्याण तथा नारी सुधार आंदोलन को गति दी 19वीं सदी से ही पर्दा प्रथा हटाने स्त्री शिक्षा सती प्रथा के उन्मूलन जैसे क्रांतिकारी कदम उठाए जाने लगे चीन का श्रेय अंग्रेजों को भी जाता है बीसवीं सदी में तो गांधी जी ने स्त्री समानता के संघर्ष को स्वराज के लिए संघर्ष से जुड़कर एकाकार कर दिया
नारी उत्थान की मांग केवल आधुनिक स्वतंत्र भारत की आवाज नहीं है वर्णन या तो स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान से ही आम भारती की मांग बनी हुई है 1917 में स्वशासन संबंधी सुधार पर रिपोर्ट तैयार करने हेतु जब चेम्सफोर्ड भारत आए तो एनी बेसेंट और सरोजनी नायडू ने उन्हें एक ज्ञापन सौंपा जिसमें यह मांग की गई थी कि विधान मंडलों में महिलाओं को भी प्रतिनिधित्व के अधिकार दिए जाएं समिति ने इस संबंध में निर्णय करने का अधिकार भारतीयों को ही सौंप दिया आश्चर्य तो तब हुआ जब 1921 में मद्रास विधान मंडल तथा 1929 में बिहार काउंसिल में भारत में सामान योगदान और योग्यता संपन्न नारियों को भी पुरुषों की ही भांति समान नागरिक अधिकार प्रदान किया जबकि इस समय तक ब्रिटेन सहित किसी भी अन्य यूरोपीय देशों में भी महिलाओं को इस तरह के अधिकार प्राप्त नहीं थे ।
स्वतंत्र भारत में महिला का प्रश्न - स्वतंत्र भारत में भी सरकार ने इस प्रयास को जारी रखा और संविधान में अनुच्छेद 16 4 के अंतर्गत या व्यवस्था की गई कि सरकार किसी भी पिछड़े वर्ग के उत्थान के लिए कोई भी कानून बना सकती है इस प्रकार भारतीय संविधान में स्थापित व्यवस्था के माध्यम से विभिन्न नियम कानून बनाकर स्त्री जागरण के विभिन्न उपाय किए गए हैं और किए जा रहे हैं 1955 में तलाक को संवैधानिक दर्जा दिया जाना 1956 में संपत्ति यों में स्त्रियों के बराबर की भागीदारी लाइनिंग समानता के आधार पर सेवाओं में अवसर प्रदान करना दहेज प्रथा को अवैध घोषित करना सती प्रथा निरोध बाल विवाह निरोधक कानून बाल शोषण निवारण कानून मातृत्व लाभ योजना राजश्री बीमा योजना की शिक्षा हेतु लड़कियों को निशुल्क शिक्षा व्यवस्था आदि नारी कल्याण के ऐसे ही अनगिनत प्रयास के रूप में देखे जा सकते हैं किंतु इन सभी में सर्वाधिक महत्व का विषय है कि महिलाओं के लिए आरक्षण की व्यवस्था यदि महिलाओं को समानता के स्तर पर लाना है तो सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उन्हें अधिकार संपन्न बनाया जाए । यदि महिलाओं को समानता के स्तर पर लाना है तो सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उन्हें अधिकार संपन्न बनाया जाए अधिकार संबंध बनाने का सर्वश्रेष्ठ तरीका यह है कि कानून तथा नीति निर्माण कार्य संस्थाओं अर्थात संसार तथा राज्य विधान मंडलों में महिलाओं के लिए स्थान आरक्षित किया जाए भारत में महिलाओं की शासन व्यवस्था में सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करने के उद्देश्य से ही संस्थाओं के चुनाव में एक तिहाई स्थानों के आरक्षण का प्रस्ताव किया गया इस तरह संविधान के 73वें संशोधन अधिनियम के अनुच्छेद 243 डी 3 के अनुसार पंचायती राज संस्थाओं के विस्तृत ग्राम पंचायत पंचायत समिति जिला परिषद सदस्य में एक तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की गई नियम के अनुसार स्थानीय संस्थाओं में महिलाओं के लिए आरक्षित करने का प्रावधान किया गया इस तरह भारत में महिलाओं के आरक्षण का यह पहला प्रयास था आज देश के सभी राज्य ताकि इस दिशा में प्रयासरत है और लगभग सभी राज्यों में पंचायती राज संस्थाओं के क्रियान्वित करने तथा भरपूर प्रयास भी किया है और सफलता पाई है नीति निर्माण के क्षेत्र में निचले स्तर पर दिए गए आरक्षण के अलावा अनेक राज्यों ने अपने यहां सरकारी सेवाओं में महिलाओं के लिए आरक्षित करने का फैसला किया जिनमें महाराष्ट्र गाड़ी है महाराष्ट्र सरकार ने महिलाओं की स्थिति में सुधार के लिए प्रदेश की सभी सार्वजनिक सेवाओं सहकारी समितियों तथा अन्य संस्थाओं में उनके लिए 30% आरक्षण की घोषणा की है हेतु लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित परीक्षा से ही महिलाओं को 20% आरक्षण देने का फैसला किया है या नारी उत्थान की दिशा में एक सराहनीय कदम है किंतु सिर्फ निचले स्तर पर ही निर्माण कार्य संस्थाओं में महिलाओं की भागीदारी में बहुत कुछ लाभ होने वाला नहीं आता आवश्यकता इस बात की है कि उन्हें लोकसभा राज्यसभा विधानसभा में एक प्रभावी भूमिका प्राप्त हो इस आशय के हेतु ही वर्ष 1997 में तत्कालीन गुजराल सरकार ने संसद में 81वा संविधान संशोधन विधेयक पेश किया जिसने हमसे 330 को तथा अनुच्छेद 332 को जोड़कर लोकसभा एवं विधानसभा में एक तिहाई अस्थान महिलाओं के लिए आरक्षित करने का प्रावधान था किंतु विभिन्न राजनीतिक दलों में तल मेल ना होने के कारण यह विधेयक पारित ना हो सका अटल सरकार ने भी 84 वें संविधान विधायक के रूप में इसे पेश करने का प्रयास किया किंतु इसे भी पारित नहीं कराया जा सका परंतु फिर भी महिलाओं के लिए आरक्षण की व्यवस्था मात्र कर देना ही उनके उत्थान के लिए पर्याप्त नहीं होगा वर्णन इसके लिए महिला समाज के सर्वोत्तम मुखी विकास जैसे शिक्षा रोजगार आर्थिक स्वालंबन आदि के प्रयास करने होंगे क्योंकि अब तक का अनुभव यही बताता है कि आरक्षण की व्यवस्था उपलब्ध करा देने वाले देशों में भी महिलाओं के राजनीतिक सहभागिता में बहुत परिवर्तन नहीं आया है और यह संख्या अभी भी उन देशों में 15 से 20 परसेंट की सीमा तक पहुंच सकी है जबकि इस में पृथक आरक्षण व्यवस्था उपलब्ध कराने वाले भी कुछ ऐसे देश है जहां उनके प्रयासों से महिलाओं को अच्छा खासा प्रतिनिधित्व प्राप्त हुआ है ऐसे देशों में स्वीडन 40.आरक्षण की व्यवस्था करने की ही नहीं महिलाओं में सामाजिक भावना विकसित कर राजनीतिक चेतना जागृत करना आर्थिक जागरूकता लाकर ही आरक्षण की व्यवस्था का भी लाभ उठाया जा सकता है ।

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