महिला सशक्तिकरण से तात्पर्य निर्णयन की प्रक्रिया में महिलाओं की सहभागिता और उनके विस्तार करने की प्रक्रिया से है। इसका मुख्य उद्देश्य महिला व पुरुष के मध्य स्थापित शक्ति संतुलन में परिवर्तन लाकर शक्ति का समानता पूर्वक वितरण करना है जिससे महिलाओं का पूर्ण विकास हो सके एक अन्य रूप में या भौतिक और दैहिक संसाधनों पर महिलाओं के नियंत्रण को भी दर्शाता है । महिला सशक्तिकरण में सामाजिक राजनीतिक आर्थिक और मनोवैज्ञानिक पक्ष शामिल होते हैं। भारत में महिलाओं के सशक्तिकरण हेतु केंद्रीय और राज्य दोनों स्तरों पर प्रयास किए जा रहे हैं। लैंगिक बजट का प्रावधान भी इसी उद्देश्य से प्रेरित है।
लैंगिक असमानता को समाप्त करना तथा विवाह तलाक पैतृक संपत्ति संबंधी महिलाओं के अधिकारों की सुरक्षा हेतु विभिन्न कानूनों में परिवर्तन और संशोधन किए गए हैं केंद्रीय स्तर पर सरकार ने कामकाजी महिलाओं के अधिकार व लैंगिक अधिकार संबंधित हाल के विधानो से महिलाओं की जहां घर से बाहर निकल कर काम करने हेतु उपयुक्त माहौल प्रदान करने की कोशिश की गई है,वहीं दूसरी ओर से भयमुक्त वातावरण में अब कार्य भी कर सकेंगे तथा उसके विरूद्ध यौन उत्पीड़न आदि गंभीर अपराधों के होने पर भी लगाम लग सकेगी।इसके साथ ही निर्णयन में महिलाओं की भागीदारी हेतु पंचायती राज्य संस्थाओं में उन्हें सरकार द्वारा 50 परसेंट आरक्षण प्रदान किया गया है जो कि निचले स्तर पर लोकतांत्रिक प्रक्रिया में महिलाओं की अपेक्षित भागीदारी को पुष्ट करता है इसके साथ ही संसद और विधान मंडलों में महिलाओं को 30% आरक्षण की कोशिश से निरंतर जारी है ।
महिला सशक्तिकरण के लिए 1985 में महिला एवं बाल विकास विभाग की स्थापना की गई।31 जनवरी 1962 को राष्ट्रीय महिला आयोग का गठन किया गया और अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जाने लगा। सभी पंचवर्षीय योजना में महिला विकास को महत्व दिया गया।भारत सरकार द्वारा 2001 को महिला सशक्तिकरण वर्ष घोषित किया गया। स्वयंसिद्धा योजना, महिला समाख्या कार्यक्रम, इत्यादि योजनाएं प्रारंभ की गई।राजीव ने अपने स्तर से प्रयास किए गए जैसे हरियाणा में देवी रूपक योजना एवं छत्तीसगढ़ में दीदी बैंक इत्यादि योजना क्रियान्वित की गई।महिला अधिकारिता क्षेत्र में संविधान के 73वें तथा 74 वें संशोधन अधिनियम मील के पत्थर कहे जा सकते हैं।73 वें संशोधन द्वारा ग्राम पंचायत क्षेत्र पंचायतों एवं जिला पंचायतों तथा 74 वें संविधान संशोधन द्वारा नगर पालिका नगर निगम तथा अन्य स्थानीय निकायों में भी सभी स्तर के एक तिहाई अस्थान महिलाओं के लिए आरक्षित किए गए जिससे महिलाओं में विशेष जागरूकता आई।
महिलाओं के आर्थिक विकास के लिए अनेक कार्यक्रमों का संचालन किया गया।सातवें तथा आठवें दशक में सरकार ने गरीबी उन्मूलन एवं स्वरोजगार के लिए जितने भी कार्यक्रम संचालित किए उनमें महिलाओं के लिए अलग से विशेष प्रावधान है।जवाहर रोजगार योजना के अंतर्गत कम से कम 30% रोजगार महिलाओं को प्रदान करना अनिवार्य किया गया। समेकित ग्राम विकास कार्यक्रम में यह रेखांकित किया गया कि कम से कम 40% महिलाएं लाभान्वित होनी चाहिए स्वरोजगार हेतु ग्रामीण युवाओं को प्रशिक्षण कार्यक्रम में कम से कम 40% महिलाएं लाभान्वित होनी चाहिए केंद्रीय समाज कल्याण बोर्ड चार दशक से भी अधिक पुराने सामाजिक आर्थिक कार्यक्रम और शिक्षा के संक्षिप्त पाठ्यक्रम में भी निर्धन एवं साधन हीन महिलाओं के आर्थिक पुनर्वास एवं शैक्षणिक स्तर में सुधार का लक्ष्य है। इन दोनों कार्यक्रमों के द्वारा महिलाओं को आत्मनिर्भर ताकि ओर उन्मुख करने का प्रयास किया जाता है।राज्य स्तर पर भी महिलाओं की राजनीतिक स्थिति मजबूत करने के प्रयास सरकारों द्वारा किए गए हैं और निरंतर जारी है सरकारी स्तर पर नीतियों में बदलाव कर ज्यादा से ज्यादा उन्हें महिला केंद्रित बनाने का प्रयास किया गया है जिससे कि महिला पुरुष समानता लाई जा सके।
आर्थिक सशक्तिकरण भी इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है क्योंकि बिना आर्थिक आधार के महिलाओं को मजबूत नहीं किया जा सकता। इसके अंतर्गत गरीबी उन्मूलन बैंक से ऋण कृषि ऋण उद्योग एवं समर्थक सेवाओं आदि के क्षेत्र में केंद्रीय स्तर पर विभिन्न प्रकार के महिला केंद्रित कार्यक्रम प्रारंभ किए गए हैं। गरीबी रेखा से नीचे रहने वाली महिलाओं के लिए योजनाओं में आरक्षण की व्यवस्था भी की गई है। गरीबी रेखा से नीचे रहने वाली महिलाओं के लिए योजनाओं में आरक्षण की व्यवस्था की गई है उनमें कौशल विकास कर्मों की सहायता से स्वालंबन का दायित्व बोध कराने का प्रयास किया जा रहा है। स्वाधार, सबला, जननी सुरक्षा, विधवा पेंशन स्कीम आदि विभिन्न योजनाएं किसी ना किसी रूप में महिला सशक्तिकरण की ओर अग्रसर है ।
दूसरी और राज्य स्तर पर भी आर्थिक नीतियों को ज्यादा से ज्यादा महिला केंद्रित बनाया जा रहा है लाडली बेटी, लक्ष्मी विदिशा, आदि कार्यक्रम केवल महिलाओं पर ही केंद्रित है । उद्योगों में महिलाओं की भागीदारी हेतु विभिन्न राज्यों ने अनेक ऋण योजनाओं को प्रारंभ किया गया है जिससे कि महिला उद्यमी राज्य स्तर पर स्वयं भी पुरुषों के समान आर्थिक रूप से सशक्त हो सके। खाद्य प्रसंस्करण, प्रसाधन, पोल्ट्री फार्म, मत्स्य पालन,बागवानी आदि विभिन्न क्षेत्रों में आज महिलाओं की सकारात्मकता भागीदारी इसी प्रकार की योजनाओं का परिणाम है।
सामाजिक सशक्तिकरण महिलाओं के संदर्भ में अधिक महत्वपूर्ण पहलू है। सरकार द्वारा भी इसकी महत्ता स्वीकार करते हुए विभिन्न सामाजिक क्षेत्रों तथा शैक्षणिक, स्वास्थ्य पर्यावरण महिलाओं के विरुद्ध हिंसा कन्या भ्रूण हत्या आदि पर विशेष ध्यान दिया गया है केंद्रीय स्तर पर उच्च माध्यमिक और प्राथमिक स्तर के साथ साथ व्यवसायिक शिक्षा से जुड़े पहलुओं पर सुधार कार्यक्रम तथा महिला केंद्र की योजनाएं चलाई गई है ।
शिक्षा में महिलाओं का अनुपात बढ़ाने के लिए निशुल्क शिक्षा कार्यक्रम के साथ-साथ पिछड़े और जनजातीय इलाकों में कस्तूरबा गांधी विद्यालय जैसे कार्यक्रम केंद्रीय स्तर पर संचालित है जिनका उद्देश्य बालिकाओं में शिक्षा की चेतना बढ़ाना है। स्वास्थ्य के क्षेत्र में जननी सुरक्षा राष्ट्रीय मातृत्व लाभ योजना कन्या भ्रूण हत्या निरोध कार्यक्रम आदि संचालित किए गए हैं। इसके साथ ही किशोरी शक्ति स्वालंबन स्वाधार घरेलू हिंसा से पीड़ित महिलाओं हेतु निवारण कार्यक्रम महिलाओं के प्रति होने वाले अपराधों और इस प्रकार की प्रवृत्तियों को नियंत्रित करने में संलग्न है राष्ट्रीय व राज्य स्तर पर महिला आयोगों का गठन महिलाओं के विरुद्ध होने वाले अत्याचार पर अंकुश लगाने के उद्देश्य से ही किया गया है।
राजू ने भी सामाजिक क्षेत्र में महिलाओं से जुड़ी अनेक योजनाओं को प्रारंभ किया है जो काफी सराहनीय है। कन्या विद्या धन बेटी बचाओ आदि जैसे कार्यक्रम महिलाओं को संबल प्रदान करने के साथ-साथ उन्हें आगे बढ़ने हेतु प्रोत्साहित भी करते हैं।लगभग केंद्र के समान ही राज्य स्तर पर भी महिलाओं हेतु विकास कार्यक्रमों का ढांचा तैयार किया गया है। इससे राष्ट्रीय विकास को एक गति मिलेगी ।
धन्यवाद ।
गरीबी उन्मूलन के लिए सरकार का एक सार्थक प्रयास ।
गरीबी उन्मूलन के लिए सरकार का एक सार्थक प्रयास ।
गरीबी उन बहुत सी महत्वपूर्ण समस्याओं में से एक है जिनका सामना आज भारत विश्व के कई अन्य देशों के साथ कर रहा है यह एक ऐसी दशा है जिससे किसी व्यक्ति को अपने जीवन यापन के लिए भोजन वस्त्र और मकान जैसी न्यूनतम आवश्यकताएं पूरी करने में भी कठिनाई होती है, यानी कि जब किसी अर्थव्यवस्था में जनसंख्या का अधिकांश भाग मूल आवश्यकताओं से वंचित होता है तो ऐसी अर्थव्यवस्था को व्यापक निर्धनता की स्थिति कहा जाता है।
गरीबी का तात्पर्य उन सामाजिक प्रक्रिया से है ,जिसने समाज का एक वर्ग अपने जीवन की बुनियादी आवश्यकताओं को पूरा करने में असमर्थ होता है । जहां समाज का एक वर्ग विलासिता पूर्ण जीवन बिता रहा हो वह दूसरे वर्ग को जीवन की बुनियादी आवश्यकताओं का मिलना गरीबी को और अधिक प्रखर बना देता है। जैसे भोजन कपड़ा, मकान एवं गरीबी की अवधारणा समाज सापेक्ष है,खासकर भारत की अगर बात करें तो गरीबी रेखा का निर्धारण सीमा का बोध कराता है, जिस तक कोई समाज इन्हे सहन करने के लिए तैयार है। जहां अमेरिका जैसे विकसित देशों में गरीबी के निर्धारण में उचित जीवन यापन के स्तर पर बल दिया जाता है वही भारत जैसे विकासशील देशों में न्यूनतम जीवन स्तर की बात की जाती है । आजादी के 70 साल बाद भी यही अवधारणा है । इस प्रकार जब समाज का एक बड़ा वर्ग न्यूनतम जीवन स्तर को पाने के लिए संघर्षरत हो तब उचित जीवन की स्तर की बात करना बेमानी है।
गरीबी उन्मूलन के लिए इंदिरा गांधी ने 1969 में गरीबी हटाओ का नारा दिया था। इसमें बढ़-चढ़कर के किसानों ने भाग लिया था । इसके बाद आधी सदी से अधिक वक्त बीत चुका है, यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि भारत में गरीबी और भयावक हुई है और यह भयावक होती जा रही है लोग आभाव घटिया जीवन स्तर और मानवीय कृतियों से पीड़ित हैं। पिछली सरकारों द्वारा लोक लुभावनी घोषणाओं के बावजूद देश के 30 फीसदी लोग ऐसी परिस्थितियों में जीने को मजबूर है जिन्हें 21वीं सदी में किसी भी प्रकार से स्वीकृति नहीं दी जा सकती। यह भ्रम की गरीबी उन्मूलन गरीबी पर प्रत्यक्ष रूप से आघात करके किया जा सकता है। रोजगार देकर नहीं ,अब तक मिथक साबित हुआ।
इस समस्या से निपटने के लिए थाईलैंड वियतनाम और इंडोनेशिया जैसे हमारे पूर्वी एशियाई पड़ोसियों ने हमसे बेहतर कदम उठाए हैं। जो सार्थक साबित हुए हैं। बेहद आश्चर्यजनक की बात है कि दक्षिण एशिया में म्यांमार से लेकर अफगानिस्तान तक गरीबी से जीवन यापन करना लोगों की एक विशेषता बन गई है। जिसमें श्रीलंका एक अपवाद है, हालांकि यह देश अपने ऊपरी प्रांतों में इसी समस्या का सामना कर रहा है। ऐसे में आत्ममंथन करने की जरूरत है। बल्कि इसे लागू भी करने की जरूरत है ।जैसे पूर्वी देश कर रहे हैं। हमें चूक कहां हो गया है। हमें आजादी प्राप्त किए करीब करीब 7 दशक बीत चुके हैं। और जिस स्थिति में पहले थे ,उसी स्थिति में अभी भी है। एक आंकड़ों के अनुसार भारत में जितनी भी ही गरीबी हो परंतु यहां लोग लंबे सूखे के बावजूद भूख से नहीं मरते देश ने अंग्रेजों के शासन काल में 1942 के दौरान अकाल और 1966 और 67 में बिहार में सूखे का समय भी देखा है। हालांकि तब से लेकर अब तक परिस्थितियां बदल चुकी है। हमारी जीवन प्रत्यास्थता १०० फीसदी बढ़ चुकी है। 100 से 50 वर्ष की आयु के वर्ग के लोगों में साक्षरता दर संतोषजनक है, परंतु भारत में बड़ी संख्या में लोग अभी भी अपनी परिस्थितियों में रहने को मजबूर हैं। अगर बात करें तो बिहार उत्तर प्रदेश छत्तीसगढ़ झारखंड वेस्ट बंगाल मध्य प्रदेश से काफी पीछे हैं अपनी गलत सोच के चलते हम बेटियों को जन्म लेने से पहले ही मार देते हैं।अधिकांश राज्यों में देखने को मिला है। इन सब का दोष अपनी पूर्व सरकारों पर मड़ना हमारी प्रवृत्ति बन चुकी है। हालांकि हमें यह ध्यान रखना होगा कि जनता को सरकार वही मिलती है जिनके लायक होती है विडंबना तो यह है कि देश का समृद्ध वर्ग गरीबी और उसके दुष्प्रभाव से बिल्कुल इत्तेफाक नहीं रखता।
स्वार्थी बनकर वह केवल अपने आसपास की सुख सुविधाओं की बेहतरी पर अपना ध्यान लगाए हुए हैं यही वजह है कि समृद्ध वर्ग को गरीबी में जीवनयापन की विषमताओं का बिल्कुल एहसास नहीं है। यही वजह है कि उसके व्यवहार व संबंधों में तल्खी और ठंडक नजर आती है। नतीजतन घरेलू हिंसा व असभ्यता के मामलों में इजाफा हो रहा है। हम अपने सामाजिक दायित्व को भूल चुके हैं। तभी तो प्रधानमंत्री को अपने स्वतंत्रता दिवस के भाषण में बड़े मुद्दों की बजाय स्वच्छ भारत के विषय में चर्चा करनी पड़ती है और ऐसा होना भी चाहिए समृद्ध वर्ग का यह असभ्य बर्ताव दिखता है। कि वह सरकार से बड़ी भूमिका पर जवाबदेही नहीं चाहते हैं ।और ना ही वह इस में सक्षम है। यही वर्ग सरकारें बनाता गिराता है ,जैसे ही इस वर्ग को लगता है, कि कोई सरकार उसके असभ्य व गरीबों के प्रति असंवेदनशील बर्ताव को बर्दाश्त नहीं करने वाली उसे बदल दिया जाता है। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने इसे बेहद इमानदारी से स्वीकारा था। कि गरीबी उन्मूलन के लिए आवंटित किए गए संसाधनों का केवल 10 प्रतिशत ही गरीबों तक पहुंचता है। इसी से गरीबी के प्रति इस मानसिकता का पता चलता है। वास्तविकता है कि गरीबी उन्मूलन के नाम पर यही समृद्धि वर्ग खजाने को लूट रहा है।मध्यमवर्गीय लोगो ने भी ऐसी परिस्थितियों का फायदा उठाया है ।
भ्रष्टाचार का रोना रोते रहने वाले इस वर्ग ने भी गरीबी उन्मूलन की योजनाओं के नाम पर बहुत ही फायदा उठाया है । इस कमी को दो स्तर पर दूर करना पड़ेगा पहला यह कि प्रशासन की निगरानी बढ़ाई जाये दूसरा यह कि इन सार्वजनिक सेवाओं को हर जरूरतमंद तक पहुंचाने की प्रणाली को बेहतर बनाए जाए इससे आवंटित संसाधनों तक पहुंच सकेंगे और भ्रष्टाचार पर लगाम कसी जा सकेगी । इस संदर्भ में जनधन, आधार और मोबाइल की तिकड़ी निश्चित रूप से कारगर सिद्ध होगी । देश के विकास के संदर्भ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नजरिया भी यही दर्शाता है गरीबी उन्मूलन के कार्यक्रम की दो मूल शर्तें हैं प्रथम कृषि संबंधों में परिवर्तन ताकि भूमि का स्वामित्व जनसंख्या के अधिकतर भाग में बढ़ सके । दूसरे उच्च वर्गों को उपलब्ध अतिरेक को समाप्त करना चाहिए । चुकी अधिकतर अतिरेक छिपे धन जैसे ब्लैक मनी के रूप में है । इसलिए आवश्यक है कि कड़े उपाय का प्रयोग किया जाए, ताकि संसाधनों के विलासपूर्ण उपयोग में अपनिर्देशन ना हो ,अर्थात गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम की सफलता के लिए अमीरी हटाओ कार्यक्रम चलाना होगा ।
इसके साथ ही सरकार ने ऐसी नीतियां और कार्यक्रम बनाए हैं, जिन्हें गरीबी उन्मूलन कहा गया है । इसमें से अनेक कार्यक्रम का लक्ष्य गरीबी से प्रभावित परिवारों के लिए नौकरी की व्यवस्था करना अर्थात उनके पूंजीगत आधार को मजबूत करना आदि है ऐसे कुछ कार्यक्रम निम्नलिखित है ।
पहला-स्वर्ण जयंती ग्राम रोजगार योजना का उद्देश्य है कि गरीब परिवारों को गरीबी रेखा से ऊपर लाना या योजना केंद्र सरकार द्वारा प्रायोजित है और 1980 से देश के सभी विकास खंडों में चलाई जा रही है इस योजना के अंतर्गत गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों को वित्तीय सहायता दी जाती है ।
दूसरा-जवाहर ग्राम समृद्धि योजना जिसका उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्र के स्त्री पुरुषों के लिए रोजगार के अवसर प्रदान करना ,जिन्हें वर्ष के अधिक दिन पर्याप्त काम नहीं मिलता है । अप्रत्यक्ष रूप से इस कार्यक्रम के फलस्वरूप वन संपदा भूमि संरक्षण छोटी कृषि योजनाओं गांव में अपने को चलाना चालू करना गांव की सड़कों अस्पतालों स्कूलों पंचायत घरों बस अड्डों का सुधार करके सामुदायिक संपत्ति में सुधार लाना यहां भी उन्हीं परिवारों को सहायता दी जाएगी जो गरीबी रेखा से नीचे है ।
तीसरा- प्रधानमंत्री रोजगार योजना और स्वर्ण जयंती शहरी रोजगार योजना के अंतर्गत वह कार्यक्रम सम्मिलित हैं। जिनका उद्देश्य शहरी क्षेत्रों के शिक्षित बेरोजगारों की सहायता करना । इस योजना में विशेषता या शहरी क्षेत्र में शिक्षित बेरोजगारों के लिए रोजगार के अवसर प्रदान किए जाते हैं । यह अपेक्षा की जाती है कि इन कार्यक्रमों में 18 से 35 वर्ष की आयु के शिक्षित बेरोजगार लाभ उठाएंगे समाज के कमजोर वर्गों के लोगों को इसमें प्राथमिकता दी जाती है ।
चौथा- ग्रामीण क्षेत्रों में अन्य कार्यक्रम के अंतर्गत रोजगार बीमा योजना और प्रधानमंत्री ग्रामोदय योजना क्रम से 1999 और 2000 और 2001 में आरंभ की गई योजनाओं का उद्देश्य गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वाले परिवारों के लिए वेतन आधारित रोजगार उपलब्ध कराना तथा उनके जीवन स्तर को ऊपर उठाना ।
पांचवा- स्वर्ण जयंती ग्राम रोजगार व शहरी रोजगार योजना आज का संचालन भी रोजगार उपलब्ध कराकर गरीबी दूर करने के प्रयास किए जा रहे हैं । सरकार द्वारा वर्तमान में गरीबी दूर करने के लिए अनेक प्रकार की योजनाएं चलाई जा रही है । तथा छोटे-छोटे दलों के अलावा बड़े-बड़े उद्यमों को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया जा रहा है ।
इसके अतिरिक्त भारत को चाहिए कि वह छोटे छोटे नगरों का विकास केंद्रों के रूप में स्थानीय श्रम और उपलब्ध कच्चे माल के प्रयोग में विकास करें इनमें विकास केंद्रों में दुग्ध शालाओं तथा पशुपालन मत्स्य पालन मुर्गी पालन लघु स्तर के उद्योग बाद में विनियोग करें। इससे जनसंख्या के एक बड़े हिस्से की बेरोजगारी की समस्या का हल निकलेगा । अब भारत में गरीबी दूर करने के लिए सरकार द्वारा अनेक तरीके अपनाए जा रहे हैं। भारतीय संविधान के नीति निदेशक सिद्धांतों में एक लक्ष्य है, कि आय तथा संपत्ति की आशाओं को कम किया जाए ताकि समाज की स्थापना हो सके । पंचवर्षीय योजना में ऐसे आयोजन का मुख्य उद्देश्य समझा गया है। और 6 पंचवर्षीय योजना का उद्देश्य ही था गरीबी हटाओ स्थापना तथा गरीबी दूर करने विकास कार्यक्रम की घोषणा करती है । परिवार नियोजन कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं । छोटे उद्योगों को दिया जा रहा है । जिससे रोजगार के अवसर बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है । यही कहा जा सकता है कि रोजगार के अवसर बढ़ाने के अलावा गरीबी उन्मूलन का कोई दूसरा विकल्प नहीं है । इसके लिए हमारी सरकार को इस समस्या के प्रति गंभीर होना होगा चाहे कोई भी सरकार आए आगामी या वर्तमान गरीबी अप्रत्यक्ष रूप से आघात करने के बजाय कौशल विकास प्रशिक्षण और युवाओं को शिक्षित करने पर जोर देना होगा ।
धन्यवाद ।
गरीबी का तात्पर्य उन सामाजिक प्रक्रिया से है ,जिसने समाज का एक वर्ग अपने जीवन की बुनियादी आवश्यकताओं को पूरा करने में असमर्थ होता है । जहां समाज का एक वर्ग विलासिता पूर्ण जीवन बिता रहा हो वह दूसरे वर्ग को जीवन की बुनियादी आवश्यकताओं का मिलना गरीबी को और अधिक प्रखर बना देता है। जैसे भोजन कपड़ा, मकान एवं गरीबी की अवधारणा समाज सापेक्ष है,खासकर भारत की अगर बात करें तो गरीबी रेखा का निर्धारण सीमा का बोध कराता है, जिस तक कोई समाज इन्हे सहन करने के लिए तैयार है। जहां अमेरिका जैसे विकसित देशों में गरीबी के निर्धारण में उचित जीवन यापन के स्तर पर बल दिया जाता है वही भारत जैसे विकासशील देशों में न्यूनतम जीवन स्तर की बात की जाती है । आजादी के 70 साल बाद भी यही अवधारणा है । इस प्रकार जब समाज का एक बड़ा वर्ग न्यूनतम जीवन स्तर को पाने के लिए संघर्षरत हो तब उचित जीवन की स्तर की बात करना बेमानी है।
गरीबी उन्मूलन के लिए इंदिरा गांधी ने 1969 में गरीबी हटाओ का नारा दिया था। इसमें बढ़-चढ़कर के किसानों ने भाग लिया था । इसके बाद आधी सदी से अधिक वक्त बीत चुका है, यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि भारत में गरीबी और भयावक हुई है और यह भयावक होती जा रही है लोग आभाव घटिया जीवन स्तर और मानवीय कृतियों से पीड़ित हैं। पिछली सरकारों द्वारा लोक लुभावनी घोषणाओं के बावजूद देश के 30 फीसदी लोग ऐसी परिस्थितियों में जीने को मजबूर है जिन्हें 21वीं सदी में किसी भी प्रकार से स्वीकृति नहीं दी जा सकती। यह भ्रम की गरीबी उन्मूलन गरीबी पर प्रत्यक्ष रूप से आघात करके किया जा सकता है। रोजगार देकर नहीं ,अब तक मिथक साबित हुआ।
इस समस्या से निपटने के लिए थाईलैंड वियतनाम और इंडोनेशिया जैसे हमारे पूर्वी एशियाई पड़ोसियों ने हमसे बेहतर कदम उठाए हैं। जो सार्थक साबित हुए हैं। बेहद आश्चर्यजनक की बात है कि दक्षिण एशिया में म्यांमार से लेकर अफगानिस्तान तक गरीबी से जीवन यापन करना लोगों की एक विशेषता बन गई है। जिसमें श्रीलंका एक अपवाद है, हालांकि यह देश अपने ऊपरी प्रांतों में इसी समस्या का सामना कर रहा है। ऐसे में आत्ममंथन करने की जरूरत है। बल्कि इसे लागू भी करने की जरूरत है ।जैसे पूर्वी देश कर रहे हैं। हमें चूक कहां हो गया है। हमें आजादी प्राप्त किए करीब करीब 7 दशक बीत चुके हैं। और जिस स्थिति में पहले थे ,उसी स्थिति में अभी भी है। एक आंकड़ों के अनुसार भारत में जितनी भी ही गरीबी हो परंतु यहां लोग लंबे सूखे के बावजूद भूख से नहीं मरते देश ने अंग्रेजों के शासन काल में 1942 के दौरान अकाल और 1966 और 67 में बिहार में सूखे का समय भी देखा है। हालांकि तब से लेकर अब तक परिस्थितियां बदल चुकी है। हमारी जीवन प्रत्यास्थता १०० फीसदी बढ़ चुकी है। 100 से 50 वर्ष की आयु के वर्ग के लोगों में साक्षरता दर संतोषजनक है, परंतु भारत में बड़ी संख्या में लोग अभी भी अपनी परिस्थितियों में रहने को मजबूर हैं। अगर बात करें तो बिहार उत्तर प्रदेश छत्तीसगढ़ झारखंड वेस्ट बंगाल मध्य प्रदेश से काफी पीछे हैं अपनी गलत सोच के चलते हम बेटियों को जन्म लेने से पहले ही मार देते हैं।अधिकांश राज्यों में देखने को मिला है। इन सब का दोष अपनी पूर्व सरकारों पर मड़ना हमारी प्रवृत्ति बन चुकी है। हालांकि हमें यह ध्यान रखना होगा कि जनता को सरकार वही मिलती है जिनके लायक होती है विडंबना तो यह है कि देश का समृद्ध वर्ग गरीबी और उसके दुष्प्रभाव से बिल्कुल इत्तेफाक नहीं रखता।
स्वार्थी बनकर वह केवल अपने आसपास की सुख सुविधाओं की बेहतरी पर अपना ध्यान लगाए हुए हैं यही वजह है कि समृद्ध वर्ग को गरीबी में जीवनयापन की विषमताओं का बिल्कुल एहसास नहीं है। यही वजह है कि उसके व्यवहार व संबंधों में तल्खी और ठंडक नजर आती है। नतीजतन घरेलू हिंसा व असभ्यता के मामलों में इजाफा हो रहा है। हम अपने सामाजिक दायित्व को भूल चुके हैं। तभी तो प्रधानमंत्री को अपने स्वतंत्रता दिवस के भाषण में बड़े मुद्दों की बजाय स्वच्छ भारत के विषय में चर्चा करनी पड़ती है और ऐसा होना भी चाहिए समृद्ध वर्ग का यह असभ्य बर्ताव दिखता है। कि वह सरकार से बड़ी भूमिका पर जवाबदेही नहीं चाहते हैं ।और ना ही वह इस में सक्षम है। यही वर्ग सरकारें बनाता गिराता है ,जैसे ही इस वर्ग को लगता है, कि कोई सरकार उसके असभ्य व गरीबों के प्रति असंवेदनशील बर्ताव को बर्दाश्त नहीं करने वाली उसे बदल दिया जाता है। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने इसे बेहद इमानदारी से स्वीकारा था। कि गरीबी उन्मूलन के लिए आवंटित किए गए संसाधनों का केवल 10 प्रतिशत ही गरीबों तक पहुंचता है। इसी से गरीबी के प्रति इस मानसिकता का पता चलता है। वास्तविकता है कि गरीबी उन्मूलन के नाम पर यही समृद्धि वर्ग खजाने को लूट रहा है।मध्यमवर्गीय लोगो ने भी ऐसी परिस्थितियों का फायदा उठाया है ।
भ्रष्टाचार का रोना रोते रहने वाले इस वर्ग ने भी गरीबी उन्मूलन की योजनाओं के नाम पर बहुत ही फायदा उठाया है । इस कमी को दो स्तर पर दूर करना पड़ेगा पहला यह कि प्रशासन की निगरानी बढ़ाई जाये दूसरा यह कि इन सार्वजनिक सेवाओं को हर जरूरतमंद तक पहुंचाने की प्रणाली को बेहतर बनाए जाए इससे आवंटित संसाधनों तक पहुंच सकेंगे और भ्रष्टाचार पर लगाम कसी जा सकेगी । इस संदर्भ में जनधन, आधार और मोबाइल की तिकड़ी निश्चित रूप से कारगर सिद्ध होगी । देश के विकास के संदर्भ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नजरिया भी यही दर्शाता है गरीबी उन्मूलन के कार्यक्रम की दो मूल शर्तें हैं प्रथम कृषि संबंधों में परिवर्तन ताकि भूमि का स्वामित्व जनसंख्या के अधिकतर भाग में बढ़ सके । दूसरे उच्च वर्गों को उपलब्ध अतिरेक को समाप्त करना चाहिए । चुकी अधिकतर अतिरेक छिपे धन जैसे ब्लैक मनी के रूप में है । इसलिए आवश्यक है कि कड़े उपाय का प्रयोग किया जाए, ताकि संसाधनों के विलासपूर्ण उपयोग में अपनिर्देशन ना हो ,अर्थात गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम की सफलता के लिए अमीरी हटाओ कार्यक्रम चलाना होगा ।
इसके साथ ही सरकार ने ऐसी नीतियां और कार्यक्रम बनाए हैं, जिन्हें गरीबी उन्मूलन कहा गया है । इसमें से अनेक कार्यक्रम का लक्ष्य गरीबी से प्रभावित परिवारों के लिए नौकरी की व्यवस्था करना अर्थात उनके पूंजीगत आधार को मजबूत करना आदि है ऐसे कुछ कार्यक्रम निम्नलिखित है ।
पहला-स्वर्ण जयंती ग्राम रोजगार योजना का उद्देश्य है कि गरीब परिवारों को गरीबी रेखा से ऊपर लाना या योजना केंद्र सरकार द्वारा प्रायोजित है और 1980 से देश के सभी विकास खंडों में चलाई जा रही है इस योजना के अंतर्गत गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों को वित्तीय सहायता दी जाती है ।
दूसरा-जवाहर ग्राम समृद्धि योजना जिसका उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्र के स्त्री पुरुषों के लिए रोजगार के अवसर प्रदान करना ,जिन्हें वर्ष के अधिक दिन पर्याप्त काम नहीं मिलता है । अप्रत्यक्ष रूप से इस कार्यक्रम के फलस्वरूप वन संपदा भूमि संरक्षण छोटी कृषि योजनाओं गांव में अपने को चलाना चालू करना गांव की सड़कों अस्पतालों स्कूलों पंचायत घरों बस अड्डों का सुधार करके सामुदायिक संपत्ति में सुधार लाना यहां भी उन्हीं परिवारों को सहायता दी जाएगी जो गरीबी रेखा से नीचे है ।
तीसरा- प्रधानमंत्री रोजगार योजना और स्वर्ण जयंती शहरी रोजगार योजना के अंतर्गत वह कार्यक्रम सम्मिलित हैं। जिनका उद्देश्य शहरी क्षेत्रों के शिक्षित बेरोजगारों की सहायता करना । इस योजना में विशेषता या शहरी क्षेत्र में शिक्षित बेरोजगारों के लिए रोजगार के अवसर प्रदान किए जाते हैं । यह अपेक्षा की जाती है कि इन कार्यक्रमों में 18 से 35 वर्ष की आयु के शिक्षित बेरोजगार लाभ उठाएंगे समाज के कमजोर वर्गों के लोगों को इसमें प्राथमिकता दी जाती है ।
चौथा- ग्रामीण क्षेत्रों में अन्य कार्यक्रम के अंतर्गत रोजगार बीमा योजना और प्रधानमंत्री ग्रामोदय योजना क्रम से 1999 और 2000 और 2001 में आरंभ की गई योजनाओं का उद्देश्य गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वाले परिवारों के लिए वेतन आधारित रोजगार उपलब्ध कराना तथा उनके जीवन स्तर को ऊपर उठाना ।
पांचवा- स्वर्ण जयंती ग्राम रोजगार व शहरी रोजगार योजना आज का संचालन भी रोजगार उपलब्ध कराकर गरीबी दूर करने के प्रयास किए जा रहे हैं । सरकार द्वारा वर्तमान में गरीबी दूर करने के लिए अनेक प्रकार की योजनाएं चलाई जा रही है । तथा छोटे-छोटे दलों के अलावा बड़े-बड़े उद्यमों को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया जा रहा है ।
इसके अतिरिक्त भारत को चाहिए कि वह छोटे छोटे नगरों का विकास केंद्रों के रूप में स्थानीय श्रम और उपलब्ध कच्चे माल के प्रयोग में विकास करें इनमें विकास केंद्रों में दुग्ध शालाओं तथा पशुपालन मत्स्य पालन मुर्गी पालन लघु स्तर के उद्योग बाद में विनियोग करें। इससे जनसंख्या के एक बड़े हिस्से की बेरोजगारी की समस्या का हल निकलेगा । अब भारत में गरीबी दूर करने के लिए सरकार द्वारा अनेक तरीके अपनाए जा रहे हैं। भारतीय संविधान के नीति निदेशक सिद्धांतों में एक लक्ष्य है, कि आय तथा संपत्ति की आशाओं को कम किया जाए ताकि समाज की स्थापना हो सके । पंचवर्षीय योजना में ऐसे आयोजन का मुख्य उद्देश्य समझा गया है। और 6 पंचवर्षीय योजना का उद्देश्य ही था गरीबी हटाओ स्थापना तथा गरीबी दूर करने विकास कार्यक्रम की घोषणा करती है । परिवार नियोजन कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं । छोटे उद्योगों को दिया जा रहा है । जिससे रोजगार के अवसर बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है । यही कहा जा सकता है कि रोजगार के अवसर बढ़ाने के अलावा गरीबी उन्मूलन का कोई दूसरा विकल्प नहीं है । इसके लिए हमारी सरकार को इस समस्या के प्रति गंभीर होना होगा चाहे कोई भी सरकार आए आगामी या वर्तमान गरीबी अप्रत्यक्ष रूप से आघात करने के बजाय कौशल विकास प्रशिक्षण और युवाओं को शिक्षित करने पर जोर देना होगा ।
धन्यवाद ।
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